भगवान महावीर और आचार्यश्री महाश्रमण

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मुनि कमलकुमार

भगवान महावीर और आचार्यश्री महाश्रमण

भगवान महावीर इस अवसर्पिणी काल के अंतिम तीर्थंकर हुए, उनका जीवन हम सभी के लिए प्रेरणादायक है। उन्होंने हर प्रतिकूल स्थिति को साधना का अंग माना और अपने जीवन को सदा संतुलित संयत और साम्य भाव से पूर्ण भावित बनाये रखा। सुनते हैं कि २३ तीर्थंकरों के कर्म एक तरफ और भगवान महावीर के अकेले के उतने कर्म होते हुए भी मात्र साढ़े बारह वर्ष की तीव्र अवस्था से उन्होंने सर्वोच्च ज्ञान केवल ज्ञान को प्राप्त कर लिया। यह सब उनकी अप्रमत्त साधनाचर्या से ही संभव हो पाया। मैं कई बार गहराई से चिंतन करता हूं तो इस स्थिति पर पहुंचता हूं कि वह समय, वह काल ऐसा था कि उस समय शारीरिक संहनन भी इस प्रकार था कि उन्होंने कानों में कीले तथा पैरों पर चंडकौशिक द्वारा किये गये प्रहार को भी साम्य भाव से सहन कर लिया।
उस समय लोगों की आस्था भी इतनी गहरी थी कि भगवान की वाणी को तहत कहकर स्वीकार कर लिया जाता तभी चौदह हजार साधु और छत्तीस हजार साध्वियों का ही नहीं लाखों श्रावक– श्राविकाओं का उन्होंने कुशल नैतृत्व किया। उस समय तीर्थंकर केवल भगवान महावीर ही थे परंतु केवल ज्ञानी अनेक साधु थे। परंतु सभी महावीर के चरणों में नतमस्तक थे।
ठीक उस समय योगक्षेम वर्ष का पावन कार्यक्रम होने के कारण सैंकड़ों साधु साध्वियों की पूरे वर्ष तक उपस्थिति प्रथम बार देखने को मिली और उस समय गुरुदेव ने प्रवचन के मध्य अपने योग्य शिष्य को महाश्रमण पद से विभूषित किया जिसको सबने श्रद्धापूर्वक स्वीकार किया। उस समय गुरुदेव तुलसी के करकमलों से दीक्षित साधु साध्वी ही नहीं पूज्य कालूगणी के द्वारा दीक्षित भी अनेक साधु साध्वी थे परंतु आपकी अप्रमत्तता समिति की अखंड आराधना, गुरु निष्ठा, आचार निष्ठा आदि को देखकर सभी नतमस्तक थे। आपको छोटी अवस्था में इतना सम्मान मिलने पर भी अहं आपके एक प्रदेश में भी स्पर्श नहीं कर सका।
आचार्यश्री महाप्रज्ञजी ने उसी वर्ष दीपावली के पावन अवसर पर अपने कर कमलों से उत्तराधिकारी के रूप में पत्र लिखकर गणाधिपति गुरुदेव तुलसी को निवेदन किया जिसे पढ़कर पूज्य गुरुदेव भी प्रसन्न हुए। यह सब हमारे सामने हुआ हम भी साक्षी बने इसका हमें गौरव है। अभी वर्ष २०२६ में लाडनूं में योगक्षेम वर्ष चल रहा है और हम देखते है कि सैकड़ों साधु साध्वी सहभागी बन रहे हैं सब गुरुदेव के कुशल मार्गदर्शन में अपनी क्षमतानुसार विकासोन्मुख है, सबके हंसते खिलते चेहरे इसकी साक्षी है। भगवान महावीर का नाम भी आगमों में कहीं कहीं महाश्रमण देखने पढ़ने को मिलता है, हमें तो यही प्रतीत होता है कि भगवान महावीर के रूप में हमें आचार्यश्री महाश्रमणजी इस पांचवें आरे में देखने को मिल रहे हैं। इतने बड़े संघ का संचालन करते हुए भी आप अपनी साधना में सदा तत्पर रहते हैं।
आपकी अप्रमत्त चर्या केवल प्रशंसनीय ही नहीं सबके लिए अनुकरणीय है। आज केवल तेरापंथ समाज के साधु, साध्वियों, समणियों श्रावक– श्राविकाओं से ही नहीं अन्य सम्प्रदाय के मान्य साधु साध्वियों के भी अहोभाव से स्वर सुनने को मिलते हैं कि जिसने महावीर को नहीं देखा वो महावीर रूप में आचार्यश्री महाश्रमणजी को देखें केवल आरे का अन्तर हो सकता है परंतु आचार में अंतर नहीं नजर आता है। भगवान महावीर जयंती पर जो विशेषांक प्रकाशित हो रहा है उसमें अन्य अनेक दिग्गज विद्वानों लेखकों के आलेख प्रकाशित होने वाले है जिससे लोगों को भगवान महावीर के साथ साथ आचार्यश्री महाश्रमणजी को भी पढ़ने का समझने का अवसर प्राप्त होगा।