गुरुवाणी/ केन्द्र
रोम-रोम में रहे प्रामाणिकता की पूंजी : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के उज्ज्वल नक्षत्र युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के विषय में ‘वह करें जो बुद्धों ने किया’ पर उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि व्यवहार कैसा होना चाहिए? इस पर आगम कार ने सुंदर दिशा निर्देश दिया है कि व्यवहार धर्मार्जित होना चाहिए, क्षमा, मार्दव, सरलता व निर्लोमता जैसे गुणों से युक्त होना चाहिए। व्यवहार में सहिष्णुता है तो एक अपेक्षा से वह धर्मोर्जित व्यवहार है।
हमारा व्यवहार प्रामाणिक होना चाहिए। हमारे वचन, शारीरिक भाषा, चिंतन, लेखन आदि में प्रामाणिकता होनी चाहिए। आदमी में प्रामाणिकता का होना जीवन की एक गरिमापूर्ण स्थिति है, जीवन की एक बड़ी पूंजी है। जिस प्रकार हमारे आराध्य आचार्यश्री भिक्षु का नाम रोम-रोम में बसा होता है, उसी प्रकार हमारे व्यवहार और भावों में सत्य और प्रामाणिकता के प्रति गहरी निष्ठा होनी चाहिए। जिसके हृदय में सच्चाई का वास होता है, वहां साक्षात प्रभु का निवास होता है। यदि कहीं थोड़ा कष्ट भी आए, अपमान भी हो जाए पर मन में यह भाव होना चाहिए कि मैं प्रामाणिकता को नहीं छोडूं।
प्रामाणिकता धर्मार्जित व्यवहार का एक अंग है। साथ ही विनम्र व्यवहार, बड़ों के प्रति सम्मान का भाव, संघ निष्ठा और व्यवहार में जागरूकता भी होनी चाहिए। जब भी कोई बड़े पधारें तो छोटों को उनका यथोचित सम्मान करना चाहिए। आवश्यकतानुसार प्रोटोकोल व लोकोपचार का पालन करते हुए अपनी वाणी और आचरण में मृदुता रखनी चाहिए अपने कर्त्तव्य के प्रति जागरूकता रखनी चाहिए। अपने दायित्व के प्रति पूर्ण सजग रहें, चाहे वह गोचरी का दायित्व हो अथवा अन्य किसी अपेक्षित व्यवस्था का। अपनी क्षमता के अनुसार जितनी धर्मसंघ की सेवा हो सके, वह करने का प्रयास करना चाहिए। धर्म संघ के सदस्यों को संघ की गरिमा के अनुरूप ही आचरण करना चाहिए। कोई बात हो तो उसका हल परस्पर संवाद से निकाल कर सौहार्द्र पूर्ण वातावरण बनाना चाहिए। जो व्यक्ति बुद्धों, मनीषियों और तत्त्वज्ञों द्वारा बताए गए इस धर्मार्जित व्यवहार के मार्ग पर चलता है, वह कभी भी निंदा को प्राप्त नहीं होता है।