गुरुवाणी/ केन्द्र
शिष्य गुरु के प्रति रखे विनय भाव : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी, युग प्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उत्तराध्ययन आगम के माध्यम से चतुर्विध धर्मसंघ को पावन देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि साधु-साध्वियों का समुदाय होता है और समुदाय का एक मुखिया भी होता है। जैन शासन में तीर्थंकर सर्वोच्च व्यक्ति होते हैं, उनसे ऊपर मनुष्यों में कोई नहीं होता है। वे वीतराग होते हैं और केवलज्ञान, केवलदर्शन संपन्न होते हैं। उनके बाद आचार्य, उपाध्याय आदि कई पदों की व्यवस्था होती है।
हमारे सम्प्रदाय के आद्य अनुशास्ता परमवंदनीय आचार्यश्री भिक्षु हुए। हम उन्हें तीर्थंकर के प्रतिनिधि और हमारे संप्रदाय के आदिकर्त्ता, जनक कह सकते है। उनके बाद की आचार्य परंपरा में अतीत में तेरापंथ धर्मसंघ के दस अध्याय लिखे जा चुके हैं और ग्यारहवां अध्याय प्रवर्धमान है। हमारे धर्मसंघ में अब तक किसी भी साधु को उपाध्याय का पद नहीं दिया गया है। हमारे धर्मसंघ में प्रमुख पद आचार्य का रहा है। आचार्य भिक्षु ने फरमाया था कि आगम में उल्लिखित सातों पदों को मैं संभाल रहा हूं और आज तक वह व्यवस्था चल रही है। अन्य पद आचार्य में ही समाहित हो जाते हैं।
जैन शासन में आचार्य का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। आचार्य की आज्ञा में साधु-साध्वियां, समणी श्रेणी आदि रहते हैं। आचार्य चतुर्विध धर्मसंघ के अनुशास्ता होते हैं। कभी गुरु कुपित या अप्रसन्न हो जाएं तो यह कैसे पता चले कि गुरु अप्रसन्न है? गुरु के कुपित होने की पहचान के छः लक्षण बताए गए हैं, जिनसे कुपित होने का अनुमान लगाया जा सकता है। पहला - शिष्य आए तो उसकी ओर आंख उठाकर भी नहीं देखना, दूसरा - शिष्य के अच्छे कार्यों को भी महत्त्व नहीं देना, तीसरा - चेहरे पर कोप लाकर उसका तिरस्कार कर देना, चौथा - शिष्य की कमियों को कोप के साथ उजागर करना, पांचवां - बोलचाल बंद कर देना और छठा लक्षण है - कोई अन्य साधु उस शिष्य या साधु की प्रशंसा करे तो गुरु के चेहरे पर प्रसन्नता के भाव नहीं आते। इस प्रकार इन छः लक्षणों से गुरु की अप्रसन्नता का अनुमान लगाया जा सकता है। परन्तु कुछ आचार्य ऐसे भी होते हैं जो शिष्य की गलती होने पर भी अप्रसन्नता प्रकट नहीं करते और सामान्य भाव से उसका मार्गदर्शन करते हैं।
आगम में कहा गया है कि यदि शिष्य को लगे कि आचार्य मुझसे कुपित हैं, ऐसी स्थिति में शिष्य को गुरु को प्रसन्न करने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए शिष्य प्रीतिकारक वचनों का प्रयोग करे, गुरु में यह विश्वास पैदा करे कि ऐसी गलती की पुनरावृत्ति अब भविष्य में नहीं करूंगा। शिष्य गुरु के प्रति विनय भाव रखे। गुरु को वंदन करे, हाथ जोड़कर गुरु के कोप को शांत करने का प्रयास करे। इस प्रकार शिष्य गुरु को प्रसन्न करने का प्रयास करें क्योंकि गुरु की अप्रसन्नता शिष्य के लिए अच्छी नहीं होती है।