गुरु के अनुशासन और उलाहना को स्वीकार कर करें विकास : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 21 मार्च, 2026

गुरु के अनुशासन और उलाहना को स्वीकार कर करें विकास : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मंगल पाथेय प्रदान करते हुए फ़रमाया कि उत्तरज्झयणाणि आगम का प्रथम अध्ययन विनय व अनुशासन का शिक्षण देने वाला है। नवदीक्षित साधु-साध्वियां और सभी साधु इस प्रथम अध्ययन का यह शिक्षण ग्रहण करने का प्रयास करें। आगम में हमें जो संदेश मिलते हैं उनका स्वाध्याय करते रहें। दशवेआलियम् आगम सीखने के पश्चात् उत्तरज्झयणाणि आगम भी द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की अनुकूलता के अनुसार सीखने और कंठस्थ करने का प्रयास करें। यह आगम हम चारित्रात्माओं के लिए एक सुंदर मार्गदर्शक है। समय-समय पर आगम का स्वाध्याय और वाचन करते रहना चाहिए। हमें यह भाव रखना चाहिए कि मैं आगम की शरण ले रहा हूं ताकि मुझे त्राण और उचित मार्गदर्शन मिले तथा मेरी साधना का क्रम सुचारू रूप से चलता रहे। जैन श्वेतांबर तेरापंथ में ३२ आगम मान्य है, ये आगम हमारे लिए एक निधि है अतः इन्हें यथानुकूल आत्मसात करने का प्रयास करना चाहिए। यह साधु-साध्वियों के लिए एक अच्छी खुराक और पोषण बन सकता है।
प्रथम अध्ययन में दो दृष्टियां बताई गई हैं। आचार्य अनुशासन करते हैं तो वाणी से कड़ा भी कह सकते हैं और थोड़ी कठोरता भी उनके व्यवहार में दिखाई दे सकती है। आचार्य के इस व्यवहार के प्रति शिष्यों की अलग-अलग दृष्टि हो सकती है। एक शिष्य जो अविनीत प्रकृति का है वह सोचता है कि गुरुदेव मुझे ठोकरें मार रहे हैं, मुझे चांटा लगा रहे हैं, मुझे गालियां दे रहे हैं, मुझ पर प्रहार कर रहे हैं। इस प्रकार का चिंतन करता है जबकि गुरु ने ऐसा कुछ नहीं किया है। इसी चिंतन से वह दुःखी बन जाता है। दूसरा सुविनीत शिष्य सोच रहा है कि सौभाग्य से मुझे ऐसे गुरु मिले हैं जो मुझे पिता और बड़े भाई के तुल्य मेरा हित चाह कर मुझे शिक्षा प्रदान कर रहें हैं। मैं गुरु की शिक्षाओं पर ध्यान दूं जिससे मेरा विकास हो जाए, परिष्कार हो जाए। मेरे कारण से गुरुदेव को इतना श्रम करना पड़ा! आगे मैं सावधानी रखने का प्रयास करूंगा। वह शिष्य विनय के दृष्टिकोण से अनुशासन को ग्रहण कर रहा है। यह अनुशासन के प्रति दृष्टिकोण का अन्तर है। यहां शिष्य को यह वास्तविक चिंतन करना चाहिए कि ये मेरे गुरु है, शिक्षा देना इनका कार्य है तथा ये मेरे विकास और परिष्कार के लिए ही मुझे कुछ कह रहे हैं।
आचार्य अनुशासन व्यवस्था और चित्त समाधि दोनों का संतुलन बनाए रखते हैं। न तो समाधि भंग हो और न ही अनुशासन की डोर इतनी ढीली हो जाए कि कोई कुछ भी करने लगे। यदि आचार्य उपालम भी दे तो साधु-साध्वियों का यह परम धर्म है कि वे उसे सहन करें और यथोचित विनय पूर्ण व्यवहार रखें। शिष्य का यह चिंतन रहे कि ये मेरे गुरु है जो फरमाएंगे मेरे हित के लिए फरमाएंगे। शिष्य का भाव रहे कि आपके चरणों में हमारा मस्तक है, आप की शिक्षाओं को हम शिरोधार्य करेंगे। जीवन में इसी विनयपूर्ण दृष्टिकोण के साथ गुरु के अनुशासन और उलाहने को स्वीकार करना ही हमारे लिए कल्याणकारी होता है। जिज्ञासा समाधान के पश्चात् मुनि जयकुमारजी ने अपने विचारों की अभिव्यक्ति दी। आज से श्रावक-श्राविकाओं के लिए प्रारंभ होने वाले प्रेक्षाध्यान शिविर के संभागियों को शिविर की उपसंपदा स्वीकार कराई। बहिर्विहार से समागत साध्वी विशद प्रज्ञाजी, साध्वी मार्दव प्रभाजी आदि ने गुरु चरणों में सामूहिक गीत व वक्तव्य द्वारा प्रस्तुति दी।