समय प्रबंधन से की जा सकती है जीवन में सफलता प्राप्त : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 20 मार्च, 2026

समय प्रबंधन से की जा सकती है जीवन में सफलता प्राप्त : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, शांतिदूत, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने ‘सुधर्मा सभा’ में आगम आधारित अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि ‘विवेक ही धर्म है’ - हमारा विवेक अनेक संदर्भों में जागृत रहना चाहिए। खाने और न खाने में, बोलने और न बोलने में विवेक अच्छा है। कहीं उपवास करना अच्छा हो सकता है तो कहीं न करना भी अच्छा हो सकता है, इन सबमें साधक का विवेक जागृत रहना चाहिए।
शास्त्रकार ने कहा है कि बाहर जाने में भी विवेक रखो। जैसे गोचरी जाना हो तो यह विवेक रखना चाहिए कि गोचरी के लिए कौनसा समय उपयुक्त है? साधु के लिए कहा गया कि समय पर बाहर निकलो और समय पर लौट आओ। जो कार्य जिस समय करने का हो, उसे उसी समय संपन्न करने का प्रयास करना चाहिए। दिनचर्या में उठने और सोने का समय मोटा-मोटी निर्धारित होना चाहिए। संगठन का मुखिया जो आचरण करता है, अन्य पर उसका प्रभाव पड़ सकता है। यदि मुखिया आचार, नियम, मर्यादा का अच्छी प्रकार ध्यान रखता है तो पीछे वालों को भी प्रेरणा मिल सकती है और पीछे वालों को भी वह कुछ कहने का अधिकारी हो सकता है। यदि स्वयं ध्यान नहीं देता है तो पीछे वालों को भी कुछ कहना हो सकता है। जैसे कमीज का ऊपर वाला बटन सही लग जाए तो नीचे के सारे बटन अपने आप सही लग जाते हैं। अतः जो काम जिस समय सम्पन्न करने का है यथौचित्य उसे उसी समय संपादित करने का प्रयास करना चाहिए।
जीवन में समय प्रबंधन अच्छा रहे तो हमारी जीवन चर्या अच्छी चल सकती है। समय प्रबंधन की कला को पूज्य प्रवर ने जैन सिद्धान्त ‘केवली समुद्घात’ के उदाहरण द्वारा समझाते हुए कहा कि जिस प्रकार केवली सीमित समय में विपुल कर्मों का क्षय करने के लिए समुद्घात करते हैं उसी प्रकार व्यक्ति को भी अपने सीमित समय में अधिकतम कार्यों को व्यवस्थित करना चाहिए। जब कार्य अधिक हो और समय कम हो तो हमें H.P.S. का सूत्र अपनाना चाहिए। H अर्थात् Happiness अर्थात् कार्य अधिक हो तो भी तनाव न पड़े और भीतर पूर्ण प्रसन्नता बनाए रखें। P से Priority अर्थात् कार्यों की प्राथमिकता तय करें। जो कार्य सबसे आवश्यक हों उन्हें पहले संपन्न करें तथा S से Sacrifice अर्थात् आवश्यकता पड़ने पर अपनी सुविधाओं जैसे नींद या अन्य कोई काम का बलिदान कर समय निकालें।
इस प्रकार जो कार्य जिस समय संपन्न करने का हो, उसे उसी समय संपन्न करने वाला व्यक्ति ही जीवन और साधना के पथ पर सच्ची सफलता प्राप्त करता है। प्रवचन उपरांत जिज्ञासा समाधान व उसके पश्चात् आज साधुओं के 10 दिवसीय प्रेक्षा ध्यान शिविर के समापन के संदर्भ में मुनि कुमारश्रमणजी, मुनि जयकुमारजी, मुनि धर्मेशकुमारजी, मुनि ध्रुवकुमारजी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। साध्वी शुभ्रयशाजी ने भी साध्वियों के प्रेक्षा ध्यान शिविर के संदर्भ में भावाभिव्यक्ति दी।