समय का अधिकाधिक सदुपयोग करने का संकल्प रहे : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 19 मार्च, 2026

समय का अधिकाधिक सदुपयोग करने का संकल्प रहे : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने लाडनूं की पावन धरा पर 'सुधर्मा सभा' में नव संवत्सर (वि.सं. 2083) के संदर्भ में आज के विषय - ‘समय का हो अंकन’ पर आगम आधारित पावन देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि वि.सं. 2082 की समाप्ति और वि.सं. 2083 का प्रारंभ हुआ है। वर्ष आता है और बीतते-बीतते संपन्नता को प्राप्त हो जाता है। व्यक्ति का जन्म दिवस आता है तो व्यक्ति के मन में उत्साह और परिपार्श्व के लोगों में भी उमंग का भाव हो सकता है। परन्तु उल्लास के साथ जिसका जन्म दिवस है उसके दिमाग में यह बात भी रहे कि मेरे जीवन का एक वर्ष और कम हो गया है। एक-एक दिन भी बीतता है तो खजाने में तो थोड़ी कमी आ ही रही है। अतः व्यक्ति जागरूक रहे और समय का अंकन हो।
जिस प्रकार बरसात का पानी बरसता है उसी प्रकार समय मानो बरस रहा है, और वो भी मुफ्त में। कोई व्यक्ति बरसात के पानी को संग्रहीत कर लेता है और समय पर उसका सदुपयोग कर लेता है तो कोई पानी को योंही नाली में व्यर्थ ही बहा देता है। ‘टाइम इज मनी’ अर्थात् समय ही धन है। जैसे एक कंजूस व्यक्ति पैसे खर्च करने से पहले यह सोचता है कि पैसा कहां लगाऊं, ठीक वैसे ही हमें अपना समय व्यतीत करने से पहले गहराई से सोचना चाहिए। वि.सं. 2083 और हमारे लिए यह योगक्षेम वर्ष का अवसर है तो इसका उपयोग प्रेक्षाध्यान, तत्वज्ञान आदि अनेक उपक्रमों के माध्यम से करना चाहिए। समय को व्यर्थ मत गंवाओ। हमें जो 24 घंटे का एक दिन-रात में समय मिलता है उसका सुन्दर प्रबंधन होना चाहिए। व्यक्ति का अलग-अलग दायित्व और परिस्थितियां हो सकती है परन्तु सामान्यतः अपनी समय सारणी निर्धारित कर लेनी चाहिए। व्यक्ति के उठने और सोने का समय मोटा-मोटी अवश्य निर्धारित हो जाना चाहिए।
समय के संदर्भ में तीन शब्द हैं - सदुपयोग, दुरूपयोग, और अनुपयोग। यदि हम समय का अच्छे कार्यों जैसे सेवा, स्वाध्याय, धर्मोपदेश, आदि में नियोजन कर रहे हैं तो वह समय का सदुपयोग है। किसी की फालतू निंदा करने या किसी प्राणी को तकलीफ देने में समय लगाना दुरूपयोग है और बिना कुछ किए केवल आलस्य में बैठे रहना अनुपयोग है। प्रकृति निष्पक्ष होकर सबको एक समान 24 घंटे देती है, यह हम पर निर्भर है कि हम उसका कैसा उपयोग करते हैं? गुरुदेव तुलसी और आचार्यश्री महाप्रज्ञजी का स्मरण करते हुए पूज्य प्रवर ने कहा कि गुरुदेव तुलसी कभी रात को देर से पोढ़ाते तब भी उनका प्रातः उठने का प्रायः नियत समय था। आचार्यश्री महाप्रज्ञजी की जीवन शैली और समय प्रबंधन कितना अद्भुत था कि 90 वर्ष के जीवन काल में, अपने महाप्रयाण के अंतिम दिन भी उन्होंने प्रवचन, आसन, और आगम का कार्य किया। सभी यह संकल्प लें कि हम अपने समय का अधिकाधिक सदुपयोग करेंगे और अपनी आत्मा के कल्याण की दिशा में निरंतर आगे बढ़ेंगे।