विनय और अनुशासन है हमारे संघ की गरिमा :आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 17 मार्च, 2026

विनय और अनुशासन है हमारे संघ की गरिमा :आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने ‘सुधर्मा सभा’ में उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि अनुशासन एक उपाय है। अनुशासन स्वयं का स्वयं पर तो होना ही चाहिए, दूसरों पर अनुशासन करने के लिए मुख्य अर्हता यह है कि व्यक्ति स्वयं पर शासन करे। जो स्वयं पर शासन करने में बहुत ही कमजोर है, उस व्यक्ति को दूसरों पर अनुशासन करने का नैतिक अधिकार नहीं है।
जो व्यक्ति स्वयं पर नियंत्रण नहीं रख सकता, ना वाणी का संयम रखता है और न ही आचार में निष्ठा, उसे दूसरों पर अनुशासन करने का नैतिक अधिकार नहीं है। इसी संदर्भ में ‘निज पर शासन-फिर अनुशासन’ का उद्घोष प्रासंगिक है। जहां संगठन और समाज है वहां अनुशासन अपेक्षित भी होता है। संगठन या समाज सुचारू रूप से चले इस हेतु सारणा-वारणा, गलतियों पर टोकना और अच्छे कार्यों के लिए प्रेरित करना बहुत महत्त्वपूर्ण और आवश्यक होता है।
गलतियों पर भी कोई कहने और समझाने वाला नहीं हो तो वह संगठन कमजोर पड़ सकता है और कभी धराशायी भी हो सकता है। इसलिए अंगुली निर्देश करना और अंगुली निर्देश करने की योगयत का होना, अपेक्षित होता है। संगठन के मुखिया, अनुशास्ता को अपने संगठन में होने वाली गतिविधियों पर दृष्टि रखना भी आवश्यक होता है। परम पूज्य गुरुदेव ने कहा कि गुरु महान होते ही हैं, पर कोई शिष्य भी इतने महान होते हैं कि यदि गुरु से बिना गलती के भी उलाहना मिल जाए तो वे उसे विनम्रता से सहन कर लेते हैं और आवेश में नहीं आते। उस समय वह शिष्य महान बन जाते हैं। तेरापंथ धर्म संघ की यह विशेषता रही है कि यहां विद्वान, दीक्षा पर्याय और उम्र में बड़े साधु-साध्वियां भी अपने गुरु के प्रति पूर्ण विनय भाव रखते हैं।
आचार्यश्री ने गुरुदेव तुलसी का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए बतलाया कि जब वे 22 वर्ष की आयु में आचार्य बने उस समय संघ में ज्ञान, उम्र और दीक्षा पर्याय में अनेक बड़े संत थे पर सभी ने उन्हें सिर आंखों पर बिठाया और पूर्ण नेतृत्व स्वीकार किया। हमारे धर्म संघ में आज भी अनेक वैदुष्य और अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ साधु-साध्वियां हैं, वे सभी अनुशासन की डोर से बंधे रहते हैं। यही विनय, आज्ञाकारिता और अनुशासन हमारे संघ की बहुत बड़ी गरिमा है, जो संगठन को सुरक्षा प्रदान करती है और संघ को निरंतर विकास की ओर ले जाती है।