गुरुवाणी/ केन्द्र
दैनिक जीवन की क्रियाओं में हो जागरूकता :आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने जैन विश्व भारती की पावन धरा पर ‘सुधर्मा सभा’ में चतुर्विध धर्म संघ को मंगल देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि आगम में ‘समिय-समित’ शब्द की परिभाषा देते हुए कहा है कि जो प्राणों का अतिपात अर्थात् प्राणातिपात नहीं करता वह समित होता है।
वर्तमान में भगवान महावीर के शासन में पंचमहाव्रतात्मक धर्म है। साधु के पांच महाव्रतों में पहला महाव्रत है- सर्व प्राणातिपात विरमण। अर्थात् अहिंसा महाव्रत। कुछ संदर्भों में अहिंसा महाव्रत धारी साधु के भी हिंसा का प्रसंग देखा जा सकता है। अहिंसा और हिंसा को निश्चय नय से देखें तो आत्मा ही अहिंसा है और आत्मा ही हिंसा है। जो अप्रमत्त है, सजग है, जागरूक है वह साधु अहिंसक है। जो साधु प्रमादी है, वह हिंसक होता है। जीव का मरना और नहीं मरना एक व्यवहार की बात है। यदि कोई अप्रमादी साधु चल रहा है और पैर के नीचे आकर कोई जीव मर जाए तो व्यवहार की भूमिका में यह हिंसा है और साधु व्यवहार में हिंसक है परन्तु निश्चय की भूमिका में साधु अप्रमत्त है और जीव मर भी गया तो भी वह साधु अहिंसक है। वह साधु पाप का भागी नहीं बनेगा। अतः हिंसा और अहिंसा को निश्चय और व्यवहार दोनों के ही आलोक में देखा जा सकता है।
व्यवहार की अहिंसा और हिंसा का भी अपना महत्व है। साधु की सामान्यतः पाद विहार चर्या है। अतः इसमें यदि ईर्या समिति से चलते हैं तो कितनी अहिंसा की आराधना हो जाती है। विहार, गोचरी, आदि के समय चलते समय यथा संभव मौन रहे और जागरूकता पूर्वक चलें कि कोई कीड़ा, मकौड़ा, आदि पैर के नीचे न आ जाए। जैन शासन में अहिंसा का सूक्ष्मता से ध्यान दिया गया है। चलने में साधना का उपयोग भी करना पड़े तो उसे भी तेज गति से नहीं चलना चाहिए इसमें भी जीव हिंसा के प्रति हमारी जागरूकता रहनी चाहिए। साधु के नंगे पांव चलना भी एक तपस्या और साधना है, इससे गति भी संतुलित रहती है और जीवों की अहिंसा की भी अधिक अच्छी तरह से पालना हो पाती है।
आज चैत्र कृष्णा चतुर्दशी और ‘अनुशासन पर्व’ के पावन प्रसंग पर हाजरी वाचन का उपक्रम हुआ। आचार्य प्रवर ने कहा कि साधु पांच महाव्रत, पांच समितियों, और तीन गुप्तियों की अखंड आराधना करे। दैनिक जीवन की छोटी-छोटी क्रियाओं में भी पूर्ण जागरूकता रहे। अहिंसा विषयक अनेक प्रेरणाएं प्रदान करते हुए आचार्य प्रवर ने कहा कि हमारी चर्या में जीवों के प्रति दया और आत्मा की रक्षा का भाव रहे, यही अहिंसा महाव्रत का सार है।