धर्म है उत्कृष्ट मंगल

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाश्रमण

धर्म है उत्कृष्ट मंगल

5. मिथ्यात्वी की करणी भगवान की आज्ञा में
मिथ्यादृष्टि प्राणी की करणी के बारे में जैन परम्परा में मतैक्य नहीं है। जैन श्वेताम्बर स्थानकवासी सम्प्रदाय के अनुसार मिथ्यात्वी की धर्म-क्रिया भगवान की आज्ञा में नहीं है। आचार्य भिक्षु ने मिथ्यात्वी की सत्क्रिया को वीतराग भगवान की आज्ञा में माना है। श्रीमज्जयाचार्य ने 'भ्रम विध्वंसन' में इसे आगम- सिद्ध किया है। एक बार पचपदरा में कालूगणी के समक्ष कुछ जैन लोग आए। उन्होंने कहा-जयाचार्य द्वारा भ्रमविध्वंसन में उल्लिखित 'मिथ्यात्वी को करणी भगवान की आज्ञा में, सिद्धान्त शास्त्र-सम्मत नहीं है। पूज्य गुरुवर ने भगवती सूत्र की चउभंगी, जिसमें बाल तपस्वी भी मोक्ष का देश आराधक बतलाया गया है, के आधार पर जयाचार्य के उक्त उल्लेख को आगमानुकूल प्रमाणित किया।
6. धर्म की कसौटियां
आचार्य भिक्षु ने धर्म की कुछ कसौटियां दीं। प्रस्तुत कृति में भी तेरापंथ-सम्मत धर्म की कुछ कसौटियां प्रगट हुई हैं—
१. धर्म खरीदा नहीं जा सकता, वह अमूल्य है।
२. धर्म उपदेश में है, बल प्रयोग और आवेश में नहीं।
३. धर्म अहिंसा है, हिंसा नहीं।
४. धर्म व्रत है, अव्रत नहीं।
५. धर्म वीतराग की आज्ञा में है, आज्ञा से बाहर नहीं।
६. धर्म पात्र-दान है, अपात्र-दान नहीं।
मोल धर्म अथवा अनमोलो? बोलो मत सकुचायो।
बल-प्रयोग आवेश धर्म है, वा उपदेश सुहायोः ।।
हिंसा-अहिंसा-मध्य प्रश्न हो, व्रताव्रते बतलायो।
किं-वा धर्म आप्त-आज्ञा में, वा विपरीत बतायो।।
पात्र-दान कल्याण-निदान, वा अपात्र कहिवायो?।
पात्रापात्र-विवेचन रेचन, ले भ्रम-मेल मिटायो ।।
(का. ३/६/२४-२६)
7. प्रामाण्य की कसौटी पर आगम
भारतीय दर्शन जगत में प्रमाणवाद एक बहुचर्चित विषय रहा है। जैन दर्शन में प्रमाणद्वयी सम्मत है-प्रत्यक्ष और परोक्ष। परोक्ष प्रमाण के पांच प्रकार हैं-स्मृति, प्रत्यभिज्ञा, तक, अनुमान और आगम। जैन धर्माभिमत आगमों के अनेक प्रकार हैं। उनमें एक है अंग। वे संख्या में ग्यारह हैं। उन्हें स्वतः प्रामाण्य की मान्यता प्राप्त है। शेष आगम जो इनसे संवादी हैं वे भी प्रमाण के रूप में स्वीकृत हैं। जो अंगों से विसंवादी हैं, वे अप्रमाण हैं। बीकानेर के कुछ जैन अनुयायियों ने पूज्य कालूगणी से पूछा- आपको कितने आगम मान्य हैं?
गुरुवर– द्वादशांगी मान्य है और द्वादशांगी से संवादी होने के कारण आगम-बत्तीसी (शेष २१ आगम) हमें मान्य हैं।
प्रश्नकर्ता– बत्तीसी के अतिरिक्त पैंतालिस और चौरासी आगमों के अन्तर्गत जो शास्त्र हैं, जिसका नंदी सूत्र में नामोल्लेख भी है, वे आपको मान्य क्यों नहीं?
समाधान की भाषा में गुरुवर बोले- बत्तीसी के अतिरिक्त आगमों का जहां तक प्रश्न है, यह स्पष्ट है कि उनमें कुछ आगम तो अभी अप्राप्य हैं और उपलब्ध आगमों के मूल स्वरूप में मिश्रण हुआ है। इस दृष्टि से महानिशीथ के तीसरे अध्ययन का एक उल्लेख मननीय है। महानिशीथ के संकलनकार लिखते हैं- 'जिन स्थलों पर पदानुरूप सूत्रालापक प्राप्त नहीं हुए, वहां श्रुतधरों ने अपने चिंतन के अनुसार उचित पदों का संकलन किया है। अब शासन देवी द्वारा प्राप्त इसकी मूल प्रति खंडित है। तथा उदेई के जन्तुओं द्वारा भी कई पन्ने विकृत कर दिए गये हैं। इसलिए इसमें जहां कहीं भी कुलिखित विसंगत तथ्य हैं, पाठक उसका दोष मुझे न दें।' कालूगणी ने कहा- इस स्थिति में उन आगमों को प्रामाण्य का पड़ा कैसे दिया जा सकता है। कालूयशोविलास के तीसरे उल्लास को नवमीं ढ़ाल में इस प्रसंग की मूल भाषा द्रष्टव्य है।