श्रमण महावीर

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाप्रज्ञ

श्रमण महावीर

भगवान आश्वासन की भाषा में बोले- गौतम! तुम अधीर क्यों हो रहे हो? तुम चिरकाल से मेरे साथ स्नेह-सूत्र से बंधे हुए हो। चिरकाल से मेरे प्रशंसक हो। चिरकाल से परिचित हो। चिरकाल से प्रेम करते रहे हो। चिरकाल से अनुगमन करते रहे हो। चिरकाल से अनुकूल बरतते रहे हो।
इससे पहले जन्म में मैं देव था, उस समय तुम मेरे साथ थे। मनुष्य जन्म में भी तुम मेरे साथ हो। मेरा और तुम्हारा संबंध चिरपुराण है। भविष्य में इस देह-मुक्ति के बाद हम दोनों तुल्य होंगे। मेरा और तुम्हारा अर्थ भिन्न नहीं होगा, प्रयोजन भिन्न नहीं होगा, क्षेत्र भिन्न नहीं होगा। हम दोनों में पूर्ण साम्य होगा, कोई भी नानात्व नहीं होगा। यह सब स्वल्प काल में ही घटित होने वाला है। फिर तुम खिन्न क्यों होते हो? तुम जागरूक रहो, पल भर भी प्रमाद मत करो।
भगवान के आश्वासन से गौतम में नव-चेतना का संचार हो गया। वे चिन्ता से मुक्त हो पुनः अप्रमाद के क्षण में आ गए। फिर भी उनके अतल में उभरती जिज्ञासा समाहित नहीं हुई। चेतना के विकास का पथ छोटा और लम्बा क्यों होता है-इस प्रश्न में उनका मन अब भी उलझ रहा था। उन्होंने अपनी उलझन भगवान के सामने रखी। भगवान ने उसका समाधान दिया। वह समाधान महान आत्मा द्वारा दिया हुआ आत्मा के उदय का महान संदेश है। उसका छोटा-सा चित्र इन रेखाओं में आलेखित होता है-
अचेतन जगत को नियम की श्रृंखला में बांधा जा सकता है, एक सांचे में ढाला जा सकता है। चेतन जगत नियमन करने वाला है। उसमें चेतना की स्वतंत्रता है। उसके चैतन्य-विकास के अनन्त स्तर हैं। उसके स्वतंत्र व्यक्तित्व की असंख्य धाराएं हैं। फिर अचेतन की भांति उसे कैसे किया जा सकता है नियमबद्ध और कैसे दिया जा सकता है उसे ढलने के लिए एक सांचा? जहां आतरिक परिवर्तन की स्वतंत्रता है, पूर्ण स्वतन्त्रता है, दिशा और गति की स्वतंत्रता है, किसी का हस्तक्षेप नहीं है, वहां मार्ग छोटा और लम्बा होगा ही। यदि ऐसा न हो तो सस्वतंत्रता का अर्थ ही क्या? सबके लिए एक ही गति से चलना अनिवार्य हो तो फिर स्वतन्त्रता और परतंत्रता के बीच भेद-रेखा कहां खींची जाए?
भगवान ने रहस्य को अनावृत करते हुए कहा- 'गौतम! इन नव-दीक्षित श्रमणों का साधना-पथ छोटा नहीं है। ये द्रुतगति से चले। इन्होंने स्नेह-सूत्र को तत्परता से छिन्न कर डाला। इसलिए ये अपने लक्ष्य पर जल्दी पहुंच गए।
'तुम अभी स्नेह-सूत्र को छिन्न नहीं कर पाए हो। तुम्हारी आसक्ति का धागा मेरे शरीर में उलझ रहा है। तुम जानते हो कि स्नेह का बंधन कितना सूक्ष्म और कितना जटिल होता है। काठ को भेद देने वाला मधुकर कमल-कोष में बन्दी बन जाता है। तुम इस बंधन को देखो और देखते रहो। एक क्षण आएगा कि तुम देखोगे अपने में प्रकाश ही प्रकाश। सब कुछ आलोकित हो उठेगा। कितना अद्भुत होगा वह क्षण!'
भगवान की निर्मल वाणी का चिंतन पा गौतम का मन प्रफुल्ल हो उठा। उनके तपःपूत मुख पर प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। आखों में ज्योति भर गई। वे सर्वात्मना स्वस्थ हो गए। उन्हें स्वप्न के बाद फिर जागृति का अनुभव होने लगा। उन्होंने सोचा-भगवान ने जो कहा- 'गौतम! पलभर भी प्रमाद मत करो'- इसका रहस्य क्या है? इसका दर्शन क्या है? क्या पलभर का प्रमाद इतना भयानक होता है, जिसके लिए भगवान को मुझे चेतावनी देनी पड़े? क्या पल-भर का प्रमाद सारे अप्रमाद को लील जाता है? मुझे इस जिज्ञासा का समाधान पाना ही होगा।
गौतम ने अपनी जिज्ञासा भगवान् के सामने रख दी। भगवान् ने पूछा- 'तुमने दीप को देखा है?'
'भन्ते! देखा है।'
'दीप जलता है, तब क्या होता है?'
'भन्ते! अंधकार के परमाणु तैजस में बदल जाते हैं। कमरा प्रकाशमय बन जाता है।'
'वह कब तक प्रकाशमय रहता है?'
'भन्ते ! तब तक दीप जलता रहे।'
'एक पल के लिए भी दीप बुझ जाए तब क्या होता है?'
'भन्ते ! तैजस के परमाणु अंधकार में बदल जाते हैं। कमरा अंधकारमय हो जाता है।'