संबोधि

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाप्रज्ञ

संबोधि

ध्यान के पथ पर वही आरूद हो सकता है जिसने सम्यक् जान लिया कि यहां कोई सार नहीं है। जो सार है उसे खोजो। सार-सत्य को जानने की जिसमें अभीप्सा जागृत होती है, वही ध्याता हो सकता है। आचार्यश्री तुलसी ने मनोनुशासनम् में कहा है- 'स्वरूपमधिजिगमिषुर्ध्याता'- जो अपने स्वरूप को (मैं कौन हूं) जानना चाहता है, वह ध्याता होता है। संसार की असारता का, पीड़ा का बोध विरक्ति लाता है, और विरक्त व्यक्ति शक्ति की खोज में निकलता है। जहां विरक्ति न हो और कोई विशेष घटना की अभिप्रेरणा न हो, वहां सामान्यतया इस महान् दुराध्य पथ पर अग्रसर होना कठिन है। कुछ लोग किसी विशेष उपलब्धि के लिए कौतूहल वश निकल पड़ते हैं किन्तु वे मंजिल तक नहीं पहुंच सकते। मंजिल पर वे ही पहुंच पाते हैं, जो साध्य के सिवाय और कुछ भी नहीं देखते, मध्य में नहीं रुकते।
स्वामी रामकृष्ण ने विवेकानंद से कहा-नरेन्द्र ! मेरे पास अणिमा आदि आठ सिद्धियां हैं। मेरे जैसे व्यक्ति के लिए उनकी कोई जरूरत नहीं। आज तक उनका कोई उपयोग नहीं किया। मैं चाहता हूं वे तुझे दे दूं। तेरे काम आयेगी। विवेकानंद ने पूछा-क्या ईश्वर प्राप्ति में वे सहयोगी हैं? कहा-नहीं। विवेकानंद ने कहा-तब मुझे नहीं चाहिए। पहले ईश्वर-प्राप्ति, उसके बाद जरूरत होगी तो वे स्वयं ले लेंगे।' सिद्धियों का प्रलोभन कोई कम लोभ नहीं है। सिद्धियों या चमत्कारों की बात इस तथ्य की सूचना है कि साधक में स्वरूप की जिज्ञासा नहीं है, स्थूल वैभव के आकर्षण को छोड़ वह सूक्ष्म में आसक्त है। आसक्ति बंधन है, संसार है। ध्याता का पहला गुण है-मुमुक्षा, मुक्त होने का तीव्र भाव। मुमुक्षा के अभाव में ध्यान का प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। दुःख-मुक्ति, पूर्ण स्वातन्त्र्य ध्यान का कार्य है। बुद्ध ने अपने भिक्षुओं से कहा-भिक्षुओ ! दूसरे प्रश्नों में मत उलझो, दुःख से मुक्त होना क्या कम है? उस तीर लगे व्यक्ति की तरह व्यर्थ मूर्खता नहीं करना। किसी व्यक्ति के शरीर में तीर लग गया। कराह रहा है। कोई आदमी निकालने के लिए आया, तब कहा-ठहरो, पहले, मेरे इन प्रश्नों का उत्तर दो। यह तीर किस दिशा से आया है? किसने बनाया है? किसका है? विषयुक्त है या निर्विष ? वह समझदार था। उसने कहा-भले आदमी ! ये प्रश्न पीछे भी पूछे जा सकते हैं। पहले इस निकलवा लो।