गुरुवाणी/ केन्द्र
शरीर रूपी नौका से करें पूर्व कर्मों का क्षय, मोक्ष के लिए जिएं जीवन : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्म संघ के एकादशमाधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने ‘जीवन क्यों जीएं?’ जैसे गहन दार्शनिक प्रश्न का आगम की रोशनी में समाधान किया। जैन विश्व भारती के सुधर्मा सभा में उपस्थित जनमेदिनी को संबोधित करते हुए आचार्यश्री ने फरमाया कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य भौतिक सुख नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साधना और मोक्ष की प्राप्ति होना चाहिए।
आत्मा और शरीर का संयोग ही जीवन : आचार्यश्री ने जीवन के स्वरूप को परिभाषित करते हुए फरमाया कि हमारे औदारिक शरीर और आत्मा का संयुक्त होना ही 'जीवन' है। इन दोनों का वियोग 'मृत्यु' कहलाता है, किंतु यदि यह वियोग सदैव के लिए हो जाए, तो वह 'मोक्ष' की परम स्थिति है। पूज्यप्रवर ने स्पष्ट किया कि न तो अकेला शरीर और न ही अकेली आत्मा जीवन कहला सकती है; दोनों का समन्वय ही मनुष्य का अस्तित्व है।
क्यों जीएं? आगम का मार्गदर्शन : 'उत्तरज्झयणाणि' आगम का हवाला देते हुए आचार्यश्री ने फरमाया कि जीवन केवल यश, कीर्ति या बाह्य जगत की आसक्ति के लिए नहीं है। पूज्य प्रवर ने फरमाया — 'आदमी को पूर्व कर्मों के क्षय के लिए इस देह को धारण करना चाहिए। शरीर एक नौका के समान है, जिसके माध्यम से संयम और तप की साधना कर संसार सागर को पार किया जा सकता है।' पूज्य प्रवर ने साधु और गृहस्थ दोनों को सचेत करते हुए फरमाया कि आवश्यक वस्तुओं का उपयोग करते समय भी मोह और 'मूर्च्छा' से बचना चाहिए।
साधना के सूत्र : आचार्यश्री ने मोक्ष की ओर बढ़ने के व्यावहारिक सूत्र प्रदान किए : आहार का अल्पीकरण : शरीर को केवल उतना पोषण दें जिससे साधना अच्छी चल सके। अल्पोपधि : भौतिक उपकरणों के प्रति कम से कम लगाव रखें। अहिंसा और संयम : जीवन में अहिंसा, ध्यान और निरंतर साधना को प्राथमिकता दें। पूर्व गृह राज्य मंत्री राजेंद्र दर्डा ने लिया आशीर्वाद : इस अवसर पर महाराष्ट्र के पूर्व गृह राज्य मंत्री श्री राजेंद्र दर्डा विशेष रूप से उपस्थित हुए। उन्होंने छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) के श्रद्धालुओं के साथ आचार्य प्रवर के दर्शन किए और मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। प्रवचन के पश्चात आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं का समाधान भी किया।