अनावश्यक संग्रह से बचें, असंग्रह वृत्ति ही अहिंसा का सुरक्षा कवच : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 12 अप्रैल, 2026

अनावश्यक संग्रह से बचें, असंग्रह वृत्ति ही अहिंसा का सुरक्षा कवच : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमणजी ने ‘संग्रह वृत्ति-बढ़ें क्यों?’ विषय पर पावन प्रतिबोध प्रदान किया। जैन विश्व भारती के सुधर्मा सभा में उपस्थित जनमेदिनी को संबोधित करते हुए आचार्यश्री ने फरमाया कि जीवन में 'असंग्रह' की चेतना जाग्रत होने पर ही मनुष्य हिंसा और मानसिक विकारों से बच सकता है।
​सहयोग ही जीवन का आधार :
आचार्यश्री ने जैन दर्शन के षट्द्रव्यवाद और नवतत्त्वों की व्याख्या करते हुए फरमाया कि इस सृष्टि में पूर्णतया निरपेक्ष होकर जीना असंभव है। मनुष्य को गति के लिए धर्मास्तिकाय, स्थिति के लिए अधर्मास्तिकाय और स्थान के लिए आकाशास्तिकाय का निरंतर सहयोग मिलता है। पूज्य प्रवर ने आचार्य उमास्वाति के सूत्र ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ को उद्धृत करते हुए फरमाया कि जीव एक-दूसरे के पूरक हैं। जिस प्रकार बीमार को डॉक्टर और विद्यार्थी को शिक्षक की आवश्यकता होती है, वैसे ही समाज के हर वर्ग को एक-दूसरे के सहयोग की अपेक्षा रहती है।
​पक्षी की भांति निष्पृह रहे साधु :
संग्रह वृत्ति पर प्रहार करते हुए आचार्यश्री ने आगम वाणी का उदाहरण प्रदान दिया। पूज्य प्रवर ने फरमाया —
​'जिस प्रकार पक्षी केवल अपने पंखों के भार के साथ आकाश में स्वच्छंद उड़ जाता है, उसी प्रकार साधु को भी अनावश्यक पौद्गलिक वस्तुओं के संग्रह से बचना चाहिए। साधु केवल अपने पात्र लेकर भविष्य की चिंता किए बिना विचरण करे, यही सच्ची निर्जरा है।'
​पूज्य प्रवर ने फरमाया कि असंग्रह की भावना न केवल साधु बल्कि गृहस्थ जीवन में भी शांति और अहिंसा की स्थापना करती है।
​शासनश्री साध्वी चंदनबालाजी को दी गई सामूहिक भावांजलि :
प्रवचन के उपरांत शासनश्री साध्वी चंदनबालाजी की स्मृति सभा का आयोजन हुआ। आचार्यश्री ने उनके संयममय जीवन का परिचय देते हुए उनकी आत्मा के प्रति आध्यात्मिक मंगलकामना की। इस अवसर पर सम्पूर्ण चतुर्विध धर्मसंघ ने 'चार लोगस्स' का सामूहिक ध्यान किया।
श्रद्धासुमन अर्पित किए :
मुख्य मुनिश्री महावीर कुमारजी, साध्वी प्रमुखा श्री विश्रुतविभाजी और साध्वी वर्या श्री संबुद्धयशाजी ने साध्वीजी के प्रति मंगलकामनाएं व्यक्त कीं। साध्वीवृंद ने सामूहिक गीत का संगान किया। शासन गौरव साध्वी राजीमतीजी, साध्वी कनकश्रीजी, मुनि कमलकुमारजी सहित अनेक चारित्रात्माओं ने अपने विचार रखे। साध्वीजी के संसारपक्षीय परिवार की ओर से श्री पुनीत जैन ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी।