पुण्य-पाप और परलोक पर श्रद्धा रखें, शुभ कार्यों में ही मानव जीवन की सार्थकता  : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 10 अप्रैल, 2026

पुण्य-पाप और परलोक पर श्रद्धा रखें, शुभ कार्यों में ही मानव जीवन की सार्थकता : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के 11वें अधिशास्ता, अखंड परिव्राजक युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने 'क्या परलोक है?' विषय पर मार्मिक उद्बोधन प्रदान किया। जैन विश्व भारती के सुधर्मा सभा परिसर में आयोजित इस धर्मसभा में आचार्यश्री ने आस्तिक और नास्तिक दर्शन के अंतर को तार्किक दृष्टिकोण से स्पष्ट किया।
दार्शनिक विचारधाराओं का विश्लेषण:
आचार्यश्री ने प्रवचन की शुरुआत करते हुए फरमाया कि विश्व में दो धाराएं प्रमुख हैं—आस्तिक और नास्तिक। जो आत्मा, पुण्य-पाप और मोक्ष पर विश्वास करता है, वह आस्तिक है। वहीं, चार्वाक जैसे नास्तिक दर्शन केवल 'प्रत्यक्ष' को मानते हैं, जिनका मंत्र है कि मृत्यु के बाद कुछ नहीं है, अतः ऋण लेकर भी सांसारिक सुखों का उपभोग करो। आचार्यश्री ने इस विचार का खंडन करते हुए फरमाया कि शरीर के भस्मीभूत होने के बाद भी आत्मा की यात्रा निरंतर जारी रहती है।
पुनर्जन्म और तर्क की कसौटी :
पूर्वजन्म की स्मृतियों के अभाव पर तर्क देते हुए पूज्य प्रवर ने फरमाया, 'केवल इसलिए कि हमें पूर्वजन्म याद नहीं है, यह कहना गलत है कि उसका अस्तित्व नहीं है। हमें वर्तमान जीवन की भी कई ताजा बातें याद नहीं रहतीं। ठीक इसी प्रकार, जो वस्तु आंखों से दिखाई नहीं देती, वह अनुपस्थित नहीं होती। उन्होंने आत्मा और पुनर्जन्म को एक शाश्वत सत्य बताया।
बुद्धिमान मनुष्य के लिए 'सुरक्षित' पथ :
शास्त्रकारों के मत को साझा करते हुए आचार्यश्री ने एक महत्वपूर्ण व्यावहारिक सूत्र प्रदान दिया। पूज्य प्रवर ने फरमाया कि यदि किसी के मन में परलोक को लेकर संदेह भी हो, तब भी बुद्धिमानी इसी में है कि वह शुभ कर्म करे।
तर्क: यदि परलोक नहीं भी हुआ, तो अच्छे कर्मों से कोई हानि नहीं होगी।
चेतावनी: लेकिन यदि परलोक और कर्म फल का अस्तित्व सत्य है (जो कि है), तो नास्तिक व्यक्ति को अपने बुरे कर्मों के भारी परिणाम भोगने पड़ेंगे।
श्रद्धा और संयम का संदेश :
आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं का आह्वान किया कि वे परलोक और मोक्ष पर अटूट श्रद्धा रखें। जीवन में त्याग, संयम और साधना को प्राथमिकता दें। उन्होंने जोर देकर फरमाया कि पाप कर्मों से बचकर ही आत्मा का कल्याण संभव है।
प्रवचन के पश्चात आचार्यप्रवर ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं का समाधान किया। सभा में बड़ी संख्या में स्थानीय एवं प्रवासी श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।