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पुरुषार्थ की शक्ति : भाग्य के भरोसे न बैठें, संयम से बदलें जीवन : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने लाडनूं की पावन धरा पर 'संयम में पराक्रम' विषय पर चतुर्विध धर्मसंघ को संबोधित किया। आचार्यश्री ने जीवन में सफलता और शांति के लिए भाग्य (Destiny) और पुरुषार्थ (Effort) के बीच सटीक संतुलन को अनिवार्य बताया। श्रद्धा ही पराक्रम का मूल: आचार्यश्री ने शास्त्रों का उल्लेख करते हुए फरमाया कि मनुष्य जन्म, धर्म श्रवण, श्रद्धा और वीर्य (पराक्रम) ये चार चीजें अत्यंत दुर्लभ हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि इनमें 'श्रद्धा' सबसे महत्वपूर्ण है। यदि मन में धर्म और संयम के प्रति गहरी श्रद्धा हो, तो संयम के पथ पर पराक्रम करना सहज हो जाता है। श्रद्धा के बिना किया गया पुरुषार्थ भटक सकता है। भाग्य 'ज्ञातव्य' है, पुरुषार्थ 'कर्तव्य :' जीवन के उतार-चढ़ाव पर मार्गदर्शन देते हुए आचार्य प्रवर ने कहा, 'इंसान को केवल भाग्य के भरोसे नहीं बैठना चाहिए और न ही केवल पुरुषार्थ के अहंकार में रहना चाहिए। अच्छा व्यक्ति वही है जो दोनों की उपयोगिता को समझे।'
भाग्यवाद : इसे कठिन समय में मानसिक शांति और समता बनाए रखने के लिए जानना जरूरी है।
पुरुषार्थवाद : यह हमारा प्राथमिक कर्तव्य है। जिस प्रकार एक सुंदर कविता के लिए शब्द और अर्थ दोनों चाहिए, वैसे ही सफल जीवन के लिए भाग्य और पुरुषार्थ का संगम आवश्यक है।
पुरुषार्थ की शक्ति...
ज्योतिष के बजाय कर्म पर दें ध्यान: आचार्यश्री ने साधु-साध्वियों एवं श्रावक समाज को परामर्श दिया कि ज्योतिष, हस्तरेखा और भविष्य फल देखने में अधिक समय नष्ट करने से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि कर्मों के योग से कठिन परिस्थितियां आ सकती हैं, लेकिन ऐसे समय में तनाव लेने के बजाय साहस और मनोबल से काम लेना चाहिए।
'पुरुषार्थ से बहुत कुछ बदला जा सकता है। किया गया प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता, भले ही फल मिलने में देरी हो जाए। उद्यमी व्यक्ति का लक्ष्मी स्वयं वरण करती है।'
जैन विद्या पुस्तकों का लोकार्पण : प्रवचन के उपरांत आध्यात्मिक जिज्ञासाओं का समाधान किया गया। इस अवसर पर समण संस्कृति संकाय द्वारा तैयार 'जैन विद्या पाठ्यक्रम' (भाग 1 से 4) की नवीन पुस्तकों का आचार्यश्री के कर-कमलों से लोकार्पण हुआ। कार्यक्रम में जैन विश्व भारती के अध्यक्ष अमरचंद लुंकड़, मालचंद बैंगानी और हनुमान लूंकड़ ने अपने विचार रखे। दिल्ली ज्ञानशाला की प्रशिक्षिकाओं ने प्रेरणादायी गीत प्रस्तुत किया।