गुरुवाणी/ केन्द्र
प्रतिकूल परिस्थितियों में भी समभाव रखना ही वास्तविक साधना : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन विश्व भारती के पावन परिसर में स्थित सुधर्मा सभा में युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने 'करें क्रोध का निवारण' विषय पर उपस्थित जनमेदिनी को संबोधित किया। अपने प्रेरणादायी प्रवचन में आचार्यश्री ने जीवन में आने वाली अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में संतुलन बनाए रखने पर विशेष बल दिया।
साधुता की कसौटी –समभाव :
आचार्यश्री ने फरमाया कि साधु जीवन में शब्द, रूप, गंध, रस और स्पर्श की अनुकूलता और प्रतिकूलता दोनों संभव हैं। एक सच्चा साधु वही है जो अनुकूल भौतिक परिस्थितियों में आकृष्ट होकर पाप कर्म का बंध न करे। पूज्यप्रवर ने स्पष्ट किया कि प्रतिकूल स्थिति में क्रोध या द्वेष का आना मानवीय अपरिपूर्णता का सूचक है। जो शांत होता है, वही संत होता है; यदि कषाय (क्रोध आदि) शांत नहीं हैं, तो संतता अधूरी है।
निंदा होने पर क्या करें? :
प्रवचन के दौरान आचार्यश्री ने एक व्यावहारिक दृष्टिकोण साझा करते हुए फरमाया कि यदि कोई हमारी निंदा या हम पर आक्रोश करे, तो बुद्धिमान व्यक्ति को आत्म-चिंतन करना चाहिए:
–यदि आलोचना में सच्चाई है, तो क्रोध के बजाय स्वयं का परिष्कार (सुधार) करें।
–यदि बात यथार्थ से परे है, तो व्यर्थ की बातों पर ध्यान देकर गुस्सा करना अनावश्यक है।
क्रोध मुक्ति के व्यावहारिक सूत्र :
आचार्यश्री ने क्रोध के वेग को रोकने के लिए कुछ अचूक उपाय भी फरमाए:
तत्काल मौन : क्रोध आने पर वाणी का प्रयोग न करें और 10-15 मिनट का मौन धारण कर लें।
स्थान परिवर्तन : आवेश के समय उस स्थान को छोड़कर भ्रमण पर निकल जाएं।
ध्यान का प्रयोग : प्रेक्षाध्यान और अनुप्रेक्षा के माध्यम से क्रोध के मूल कारणों का निवारण संभव है।
गृहस्थों के लिए सफलता का मंत्र :
पारिवारिक और सामुदायिक जीवन में शांति हेतु आचार्यश्री ने मुखिया और बड़ों के लिए विशेष सूत्र दिया। पूज्य प्रवर ने फरमाया कि परिवार चलाने के लिए 'कहना, सहना और शांति से रहना' अनिवार्य है। जहाँ तक संभव हो, विवेक का प्रयोग करते हुए विवाद की स्थिति में मौन रहने का प्रयास करना चाहिए।
कार्यक्रम के अंत में पूज्य प्रवर ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं का समाधान किया। मंगल प्रवचन के दौरान श्रावक- श्राविकाएं उपस्थित रहे।