रचनाएं
धर्म के आदिकर्ता-भगवान ऋषभ
भारतीय संस्कृति धर्म प्रधान रही है। हमारे भारत वर्ष में वेद, पुराण, आगम और उपनिषद् जैसे ग्रंथों का अटूट भंडार है। इस भूमि पर अनेक महापुरुषों ने जन्म लेकर पथ-प्रदर्शन किया है। जैन परंपरा के आदि तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव हुए हैं, जिन्हें आदिनाथ के रूप में ख्याति प्राप्त है। भगवान ऋषभ का जन्म अयोध्या में माता मरुदेवा की कुक्षि से हुआ। उन्होंने आदि मानव को असि, मसि और कृषि का बोध दिया। साधना के पथ पर अग्रसर होने के बाद, भिक्षा विधि से अज्ञात होने के कारण उन्हें आहार प्राप्त नहीं हो सका। यों करते हुए उन्हें चार सौ दिन की निराहार तपस्या हो गई।
अंततः वैशाख शुक्ला तृतीया के दिन उन्होंने हस्तिनापुर में श्रेयांस कुमार के हाथों इक्षुरस ग्रहण कर पारणा किया। भगवान ऋषभ की तपस्या का पारणा होने से वह तिथि युगों-युगों के लिए 'अक्षय तृतीया' के रूप में प्रसिद्ध हो गई। आज भी इस परंपरा का अनुसरण करते हुए अनेक साधक वर्ष भर की तपस्या करते हैं और गुरु सन्निधि में इक्षुरस से पारणा संपन्न करते हैं। पर्व का महत्व सामाजिक व धार्मिक दोनों दृष्टियों से है। जैन समाज को विरासत में प्राप्त इस संस्कृति को सुरक्षित रखने का दायित्व है। हमें अपनी आत्मशक्ति का समुचित उपयोग कर जीवन को उच्चता की दिशा में ले जाना चाहिए।