अक्षय तृतीया और भगवान ऋषभ

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मुनि जिनेश कुमार

अक्षय तृतीया और भगवान ऋषभ

भारतीय पर्वों की शृंखला में एक विशिष्ट पर्व है अक्षय तृतीया। अक्षय तृतीया एक मांगलिक पर्व है। यह दिन विवाह, गृहप्रवेश आदि मांगलिक कार्यों के लिए शुभ माना जाता है। इस दिन किसान खेतों में हल चलाकर कृषि कार्यों का प्रारंभ करते हैं। यह पर्व दीपावली व होली की तरह जनमानस में प्रतिष्ठित है। अक्षय तृतीया 'सत्यम् शिवम् सुंदरम्' की अनुभूति का विलक्षण पर्व है। जैन धर्म में अक्षय तृतीया आदि तीर्थंकर भगवान ऋषभ के पारणे से जुड़ा हुआ है। भगवान ऋषभ 24 तीर्थंकरों में प्रथम तीर्थंकर हुए हैं। वे सभ्यता और संस्कृति की विकास यात्रा के पुरोधा तथा कर्मयुग और धर्मयुग के प्रणेता थे। वे असि, मसि और कृषि के मंत्रदाता थे। वे युगदृष्टा, युगसृष्टा और युगपुरुष थे। उन्होंने संसार व संन्यास का जीवन जीकर कर्म-बंधन व कर्म-मुक्ति का राज प्रकट किया।
भगवान ऋषभ का जन्म इक्ष्वाकु वंश में हुआ। उनकी माता का नाम मरुदेवा व पिता का नाम नाभि था। उनका चिह्न वृषभ और वर्ण स्वर्ण था। जब वे सांसारिक कर्तव्यों को पूर्ण कर चुके, तब उन्होंने प्रवृत्ति से निवृत्ति की ओर प्रस्थान किया। उन्होंने चैत्र कृष्णा नवमी के दिन जैन दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा के पश्चात् अंतराय कर्म के उदय से उन्हें एक वर्ष से भी अधिक समय तक शुद्ध भिक्षा प्राप्त नहीं हुई। विचरण करते-करते प्रभु हस्तिनापुर पधारे। वैशाख शुक्ला तृतीया के दिन प्रभु भिक्षा हेतु राजमार्ग से पधार रहे थे। उसी समय श्रेयांस कुमार ने प्रभु को देखा और उन्हें 'जाति स्मरण ज्ञान' हुआ। श्रेयांस कुमार ने प्रभु से भिक्षा के लिए निवेदन किया और उन्हें इक्षुरस (गन्ने का रस) का दान दिया। श्रेयांस कुमार के हाथों प्रभु के कठोर तप का पारणा हुआ। वह दान 'अक्षत' बन गया और वह तृतीया 'अक्षय' बन गई। तप धर्म साधना का प्राण तत्व है। निष्काम तप चेतना को निर्मल बनाता है। वर्षीतप की आराधना करने वाले सभी तपस्वी अक्षय तृतीया के दिन इक्षुरस से पारणा कर अपने आपको धन्य महसूस करते हैं। तप से कर्मों की निर्जरा होती है और यह मोक्ष का मार्ग है।