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पराक्रम का पर्व - अक्षय तृतीया
भारतीय संस्कृति में अनेक पर्व-त्योहार मनाए जाते हैं। उन पर्वों में एक विशिष्ट पर्व है अक्षय तृतीया, जिसे हम जनभाषा में 'आखातीज' के नाम से भी जानते हैं। अक्षय तृतीया के साथ कुछ ऐतिहासिक घटनाएं भी जुड़ी हुई हैं, जो इस प्रकार हैं :
l वर्ष भर में 4 दिवसों को 'अबूझ मुहूर्त' के रूप में स्वीकार किया गया है, उनमें एक अक्षय तृतीया है।
l आखातीज को किसानों की दीवाली कहा जाता है।
l युधिष्ठिर को अक्षय पात्र मिला, वह शुभ दिन अक्षय तृतीया था।
l दुशासन द्वारा द्रौपदी का चीरहरण किया गया, तब द्रौपदी को श्रीकृष्ण द्वारा अक्षय वस्त्र मिला; वह दिन अक्षय तृतीया का था।
l सगर राजा के प्रपौत्र भगीरथ ने पृथ्वी पर गंगा प्रवाहित की, वह दिन अक्षय तृतीया का था।
l वेदव्यास जी ने महाभारत लेखन कार्य का प्रारंभ अक्षय तृतीया के दिन ही किया था।
l कृष्ण-सुदामा के पुनः मिलन का पवित्र दिन अक्षय तृतीया था।
l अक्षय तृतीया के दिन ही रथ यात्रा के रथ निर्माण का कार्य शुरू किया जाता है।
l बद्रीनाथ तीर्थ-धाम के कपाट अक्षय तृतीया के दिन से ही खुलते हैं।
जैन परंपरा में आदि तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की लगभग तेरह महीनों की तपस्या का पारणा उनके प्रपौत्र श्रेयांस के द्वारा हुआ, वह पवित्रतम दिवस अक्षय तृतीया है। जैन धर्म में अक्षय तृतीया का पर्व भगवान ऋषभ की तपस्या के साथ जुड़ा है। सभी भारतीय दर्शनों में तप को करणीय अनुष्ठान के रूप में स्वीकार किया गया है। अन्य क्रियाओं में मतभेद दिख सकता है, परंतु तप को सबने निर्विवाद 'सोना' बताया है। तपस्या कोई भी करे, उसका प्रभाव अवश्य पड़ता है।
मोक्षमार्ग चार प्रकार से मिलते हैं: पहला है ज्ञान-दर्शन-चारित्र और तप। दूसरा प्रकार है दान-शील-तप और भाव। दोनों में तप मुख्य तत्व है। इससे ही हम तप का महत्व समझ सकते हैं। तप केवल तपस्वी की तासीर और तस्वीर ही नहीं बदलता, बल्कि तकदीर बदलने में भी सहायक बनता है।
मेरा मानना है कि आठ दिनों की तपस्या करना आसान है, परंतु वर्षीतप करना अति दुरुह है। वर्ष भर में ठंड, गर्मी आदि अवसरों में स्वयं को सतत तप में लगाए रखना प्रबल पराक्रम का कार्य है। कहते हैं संवत् प्रवर्तक सम्राट विक्रमादित्य के जीवन का एक प्रसंग है—एक शाम उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा की खातिर 'दरिद्रनारायण' की मूर्ति खरीदकर राजमहल में रख दी। मानो भूकंप आया हो, वैसे ही प्रथम रात्रि के प्रथम प्रहर में लक्ष्मी देवी आईं और कहा, 'मैं दरिद्रनारायण के साथ नहीं रह सकती, अतः जा रही हूँ।' सम्राट ने कोई आजीजी नहीं की, न हाथ जोड़कर रहने को कहा; उन्हें जाने दिया। दूसरे प्रहर में सरस्वती ने और तीसरे प्रहर में कीर्ति देवी ने विदा ली।
रात्रि के अंतिम प्रहर में जब पराक्रम के देवता विदा होने को तैयार हुए, तब विक्रमादित्य ने छलांग लगाकर ललकारा—'पहले मुझसे युद्ध करो, मुझे परास्त करो, फिर जा सकते हो।' राजा के शौर्य पर पराक्रम देवता मुग्ध हो गए और सोचने लगे—'मेरी विदा के समय ऐसा पराक्रम!' वह वहीं रुक गए। कुछ ही समय में लक्ष्मी, सरस्वती व कीर्ति तीनों देवियाँ भी पुनः लौट आईं। अतः जहाँ सत्त्वशीलता और पराक्रमशीलता होती है, वहाँ अशक्य लगने वाले कार्य भी शक्य बन जाते हैं। वर्षीतप की साधना वाले तपस्वी सार्थक जीवन में ऐसा पराक्रम दिखाकर ही वर्षीतप को पूर्ण कर पाते हैं। वर्षीतप वही पराक्रमी कर सकता है जो अपनी रसनेन्द्रिय पर स्वयं नियंत्रण रखता है। वरना उस सेठ जी की तरह हम अधिकतर रसनेन्द्रिय के दास बन जाते हैं।
एक सेठ के पुत्र की सगाई हुई। पहली बार सपरिवार अपने संबंधी के यहाँ गए। संबंधी जी ने आग्रह करके भोजन करवाया। जब एक और रोटी की मनुहार की, तो सेठ ने कहा—'अब पेट भर गया है, बिल्कुल जगह नहीं है।' इतने में एक व्यक्ति गुलाब जामुन ले आया। संबंधी जी ने मनुहार की, तो सेठ जी 5-7 गुलाब जामुन खा गए। संबंधी जी ने कहा—'सेठ जी! आप तो कह रहे थे पेट में बिल्कुल जगह नहीं है, फिर ये गुलाब जामुन कैसे खा लिए?' सेठ जी ने कहा—'देखो, बस में सब पैसेंजर से सीटें फुल हो जाएँ, तो भी कंडक्टर की जगह तो हो ही जाती है।'
सचमुच पांच इन्द्रियों में रसनेन्द्रिय को जीतना सबसे मुश्किल है। इसी भावना को उपाध्याय विनय विजय जी ने 'शांत सुधारस' काव्य में कहा है–
शमयति तापं गमयति पापं रमयति मानस हंसम्।
हरति विमोहं, दुरारुहं, तप इति विगता संशम्।।
भगवान ऋषभ द्वारा की गई वर्ष भर की तपस्या के उपलक्ष्य में आज भी जैन समाज में हजारों लोग वर्ष भर तक एकांतर तप करके वर्षीतप की साधना करते हैं। तेरापंथ धर्मसंघ में परम पूज्य आचार्य प्रवर के सानिध्य में सैकड़ों लोग अपने वर्षीतप का समापन करते हैं।
ऐतिहासिक अक्षय तृतीया का पर्व हमें तीन संदेश देता है:
1. अज्ञान दशा में या हँसते-हँसते किए कार्यों से भी भयंकर कर्म बँध सकते हैं। जैसे भगवान ऋषभ के आदेश से बैलों को चार प्रहर तक खाने में अंतराय आई, फलस्वरूप भगवान ऋषभ को 400 दिन तक आहार प्राप्त नहीं हुआ।
2. कर्म तीर्थंकर को भी नहीं छोड़ते—कर्म तटस्थ हैं, सबके साथ न्याय करते हैं। तीर्थंकरों को भी रियायत नहीं है, तो हमारा अस्तित्व ही क्या है। अतः हम कर्म करते समय सावधान रहें। शुभ कर्मों का उत्कृष्ट फल तीर्थंकर पद की प्राप्ति है, तो अशुभ कर्मों से भारी अंतराय कर्म भी बँध सकते हैं।
3. कर्म के परिणाम को समभाव से सह लेना—भगवान ऋषभ प्रतिदिन गोचरी (भिक्षा) के लिए जाते थे। कुछ नहीं मिलता, तब भी वही प्रसन्नता बनी रहती थी। तभी तो साधुओं के लिए कहा जाता है—'भिक्षा मिले तो संयम वृद्धि, और न मिले तो तप वृद्धि।'
परम श्रद्धेय आचार्य प्रवर के दीक्षा प्रदाता शासन स्तंभ श्रद्धेय मंत्री मुनिश्री के जीवन का भी एक पक्ष अक्षय तृतीया से जुड़ा हुआ है। मंत्री मुनि सुमेरमल जी स्वामी का देवलोक गमन भी अक्षय तृतीया के पावन दिन हुआ था। वह अपने जीवन का एक संस्मरण अंतराय से संबंधित प्रायः अक्षय तृतीया के अवसर पर सुनाते थे। वह कहते कि—हम नौ संत पंजाब की ओर साथ में विहार कर रहे थे। लंबे विहार के बाद एक छोटे से गाँव में पहुँचे। मैं गोचरी के लिए एक रावले (ठाकुर का घर) में गया। आहार की गवेषणा की, तो नई बहू आई और बड़ी भक्ति के साथ कहा—'पधारो महाराज! रोटियाँ बनी हुई हैं।' 'आप कितने संत हो?' मैंने कहा—'नौ हैं।' बहन ने बाजरे की नौ रोटियाँ उठाईं और बड़ी भावना से देने को तैयार हुई। मैंने भी सोचा कि थकान है, चलो आहार तो मिला। जब मैंने लेने के लिए पात्र निकाला, तब बहन स्वतः बोलने लगी कि 'आप सूखी रोटी कैसे खाएँगे?' पास में कच्चे प्याज पड़े थे, उनमें से दो-तीन उठाए और रोटियों पर रखते हुए बोली—'लो बाबा जी! प्याज के साथ खा लेना।' मंत्री मुनिश्री फरमाते कि ऐसी अंतराय भी आती है, यह उस दिन अनुभव किया।
अतः वर्षीतप करने वाले हर साधक के लिए यह संदेश मिलता है कि हमारी तपस्या भौतिक उद्देश्य के साथ न हो, प्रशंसा और सम्मान के लिए न हो। हमारी तपस्या में अहंकार और आडंबर न हो। ऐसा दुरुह वर्षीतप करने वालों के प्रति बारंबार अनुमोदना।