धर्म है उत्कृष्ट मंगल

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाश्रमण

धर्म है उत्कृष्ट मंगल

इस प्रकार डालगणी पूर्व आचार्य द्वारा घोषित आचार्य नहीं, संघ द्वारा स्थापित आचार्य हुए। वे माणकगणी से दीक्षापर्याय में ज्येष्ठ धे।
पूज्य गुरुदेव श्री तुलसी तेरापंथ के नौवें आचार्य रहे हैं। उन्होंने अपने जीवनकाल में ही विक्रम संवत् २०३५ में मुनि श्री नथमलजी (महाप्रज्ञ) को अपना युवाचार्य घोषित किया। यह संघ को साधारण परम्परा के अनुरूप कार्य था। वि. सं. २०५० सुजानगढ़ में मर्यादा-महोत्सव के दिन मुख्य कार्यक्रम में गुरुदेव ने युवाचार्य महाप्रज्ञ को आचार्य घोषित किया, स्वयं आचार्यपद से मुक्त बने। यह घोषणा तेरापंथ की सामान्य परम्परा से हटकर थी। सामान्य परम्परा के अनुसार पूर्व आचार्य के देहावसान के बाद युवाचार्य आचार्य बनता है। आचार्य की घोषणा के साथ ही श्री महाप्रज्ञ तेरापंथ के दसवें आचार्य हो गए! आचार्य पदाभिषेक समारोह वि. सं. २०५१ माघ शुक्ला षष्ठी को दिल्ली में मनाया गया। धर्मसंघ को एक दार्शनिक, मनीषी एवं विभिन्न विशेषताओं से सम्पन्न एक महान् व्यक्तित्व का नेतृत्व प्राप्त हो रहा है। धर्मसंघ में अध्यात्म के नए कीर्तिमान स्थापित हों, उसका श्रेय पूज्यश्री को प्राप्त हो, मंगल कामना।
अनुशासन का प्रतीक : मर्यादा-महोत्सव
हिन्दुस्तान के इतिहास में १५ अगस्त एवं २६ जनवरी महत्त्वपूर्ण दिन हैं। १५ अगस्त को
भारत स्वतंत्र हुआ एवं २६ जनवरी को उसका संविधान प्रभावी हुआ। तेरापंथ के इतिहास में आषाढ़ी पूर्णिमा एवं माघ शुक्ला सप्तमी का बहुत बड़ा संघीय महत्त्व है। विक्रम संवत् १८१७ आषाढ़ी
पूर्णिमा के दिन तेरापंथ संघ की स्थापना हुई एवं वि. सं. १८५९ माघ शुक्ला सप्तमी को इसका एक लिखत (एक विशेष मर्यादा पत्र अथवा संविधान) लिखा गया। उसी के उपलक्ष में प्रतिवर्ष मर्यादा-महोत्सव मनाया जाता है। प्रथम मर्यादा-महोत्सव श्रीमज्जयाचार्य ने वि. सं. १८२१ में बालोतरा 'मारवाड़' में मनाया था।
महामना आचार्य भिक्षु ने शताब्दीद्वय पूर्व तत्कालीन साधु-समाज को परखा, साधना में आने वाले विघ्नों को पहचाना और उन्होंने पाया कि कुछ मर्यादाएं अनिवार्य हैं जिनके भीतर रहता हुआ साधक साधना में आने वाले अनेक अवरोधों से बच सकता है। उन्होंने मर्यादा के रूप में कुछ लक्ष्मण-रेखाएं खींचीं। यह कहा जा सकता है तेरापंथ के विकास में आचार्य भिक्षु की उन मौलिक मर्यादाओं का बहुत बड़ा हाथ है। तेरापंथ की मौलिक मर्यादाएं इस प्रकार हैं-
सर्व साधु-साध्वियां एक आचार्य की आज्ञा में रहें।
विहार, चतुर्मास आचार्य को आज्ञा से करें।
अपने शिष्य न बनाएं।
आचार्य अपने गुरु भाई या शिष्य को उत्तराधिकारी चुने तो सब साधु-साध्वियां उसे सहर्ष स्वीकार करें।
गण के पुस्तक-पन्नों आदि पर अपना अधिकार न करें।
गण से बहिष्कृत या बहिर्भूत व्यक्ति से संस्तव न करें।
पद के लिए उम्मीदवार न बने।
कुछ वर्षों पूर्व आचार्य श्री तुलसी ने एक प्रेरक घोष दिया था- 'निज पर शासन-फिर
अनुशासन' यह सूत्र अनुशास्ता की अर्हता को प्रकट करता है। औरों पर अनुशासन करने के लिए आवश्यक है पहले स्वयं पर अनुशासन करना। जो स्वयं अच्छा शिष्य होता है वही अच्छा शास्ता बन सकता है। तेरापंथ के द्वितीय आचार्य श्री भारमलजी स्वामी अनुशास्ता बनने से पहले अपने गुरु आचार्य श्री भिक्षु के सुशिष्य बने और उनके कठोर अनुशासन में रहे। तभी तो उनका जीवन स्वामीजी की प्रयोगशाला थी। आचार्य श्री भिक्षु संघ में कोई भी नियम लागू करते तो उसका प्रथम प्रयोग भारमलजी पर करते जिसका परिणाम होता अन्य मुनियों में सजगता वृद्धि।
रात को स्वाध्याय के समय भारमलजी स्वामी को नींद आती तो उन्हें खड़े-खड़े स्वाध्याय करने का निर्देश मिलता और वे खड़े-खड़े हजारों पद्यों का स्वाध्याय करते। इन घटनाओं से यह स्पष्ट है कि अनुशासन को पालने वाले व्यक्ति ही योग्य अनुशास्ता बन सकते हैं।
आचार्य मघवा तेरापंथ के पांचवें आचार्य थे। लघुवय में ही उन्होंने अपने गुरु श्रीमज्जयाचार्य का विश्वास एवं कृपाभाव प्राप्त किया। कोमलता, विनम्रता उनके जीवन की पहचान थी।