श्रमण महावीर

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाप्रज्ञ

श्रमण महावीर

भगवान ने मौन-भंग करते हुए कहा- 'बोलो मेघ! क्या चाहते हो?'
'भंते! आपकी शरण चाहता हूं, और कुछ नहीं चाहता।'
'मूर्च्छा में तो नहीं कह रहे हो?'
'भंते! प्रत्यक्ष दर्शन के बाद मूर्च्छा कहां?'
'तो अटल है तुम्हारा निश्चय?'
'भंते ! अब टलने को अवकाश ही कहां है? आपने बाहर जाने का दरवाजा ही बंद कर दिया।'
भगवान ने मेघ को अर्थभरी दृष्टि से देखा। वह धन्य हो गया। उसकी चेतना अपने अस्तित्व में लौट आई। उसका हृदय-कोश शाश्वत ज्योति से जगमगा उठा।
वह मन ही मन गुनगुनाने लगा-
'बहुत लोग नहीं जानते-
मैं पूरब से आया हूं कि पश्चिम से?
दक्षिण से आया हूं या उत्तर से?
दिशा से आया हूं या विदिशा से?
ऊपर से आया हूं या नीचें से?
भगवान ने मुझे ढकेला अतीत के गहरे में,
मैं देख आया हूं, मेरा पहला पड़ाव।
भंते। वह द्वार भी खोल दो,
मैं देख आऊं मेरा अगला पड़ाव।
समता के तीन आयाम
हमारे जगत् का मूल एक है या अनेक ? एकता मौलिक है या अनेकता? दृश्य जगत् बिम्ब है या प्रतिबिम्ब? ये प्रश्न हजारों-हजारों वर्षों से चर्चित होते रहे हैं। इनमें से दो प्रतिपत्तियां मुख्य हैं-एक अद्वैत की और दूसरी द्वैत की। वेदान्त की प्रतिपत्ति यह है कि जगत् का मूल एक है। वह चेतन, सर्वज्ञ और सर्वेश्वर है। उसकी संज्ञा ब्रह्म है। एकता मौलिक है, अनेकता उसका विस्तार है। हमारा जगत् प्रतिबिम्ब है। बिम्ब एक ब्रह्म ही है। एक सूर्य हजारों जलाशयों में प्रतिबिम्बित होकर हजार बन जाता है। प्रातःकाल सूर्य की रश्मियां दूर-दूर फैलती हैं, सांझ के समय वे सूर्य की ओर लौट आती हैं। यह जगत् ब्रह्म की रश्मियों का फैलाव है। यह लौटकर उसी में विलीन हो जाता है।
सांख्य की प्रतिपत्ति यह है कि जगत् के मूल में दो तत्त्व हैं- प्रकृति और पुरुष (आत्मा)। प्रकृति अचेतन है और पुरुष चेतन। पुरुष अनेक हैं, इसीलिए एकता मौलिक नहीं है। चेतन और अचेतन में बिम्ब और प्रतिबिम्ब का सम्बन्ध नहीं है।
महावीर की प्रतिपत्ति इन दोनों प्रतिपत्तियो से भिन्न है। उनका दर्शन है कि विश्व का कोई भी तत्त्व या विचार दूसरों से सर्वथा भिन्न नहीं है। इस अर्थ में उनकी प्रतिपत्ति दोनों से अभिन्न भी है। महावीर ने बताया कि अस्तित्व एक है। उसमें चेतन और अचेतन का विभाजन नहीं है। उसमे केवल होना ही है। वहां होने के साथ कोई विशेषण नहीं जुड़ता। जहां केवल होना है, कोरा अस्तित्व है, वहां पूर्ण अद्वैत है। अस्तित्व की एकता के बिन्दु पर महावीर ने अद्वैत का प्रतिपादन किया। विश्व में केवल अस्तित्व की क्रिया होती तो यह जगत् होने के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता। पर उसमें अनेक क्रियाएं और उनकी पृष्ठभूमि में रहे हुए अनेक गुण हैं। एक तत्त्व में चैतन्यगुण और उसकी क्रिया मिलती है। दूसरे तत्त्व में वह गुण और उसकी क्रिया नहीं मिलती। गुण और क्रिया की विलक्षणता के बिन्दु पर महावीर ने द्वैत का प्रतिपादन किया। महावीर न द्वैतवादी हैं और न अद्वैतवादी। वे द्वैतवादी भी हैं और अद्वैतवादी भी हैं। उनके दर्शन में विश्व का मूल एक भी है और अनेक भी है। अस्तित्व जैसे व्यापक गुण की दृष्टि से देखें तो एकता मौलिक है। चैतन्य जैसे विलक्षण गुण की दृष्टि से देखें तो अनेकता मौलिक है। निष्कर्ष की भाषा में कहें तो एकता भी मौलिक है और अनेकता भी मौलिक है।