स्वाध्याय
संबोधि
सालंबन और निरालंबन ध्यान को समझने से पूर्व हमें यह जान लेना चाहिए कि ध्यान प्रशस्त भी होता है और अप्रशस्त भी, शुभ भी होता है और अशुभ भी। यह महावीर की अपनी विशिष्ट देन है। ध्यान प्राणीमात्र में होता है। मनुष्य उसकी अभिव्यक्ति का मुख्य केन्द्र है, जिसमें ध्यान की सर्वोच्च योग्यता है। परमात्मा का द्वार यदि किसी के लिए खुला है तो वह मानव मात्र के
लिए है। ध्यान उसका अनन्यतम साधन है। मनुष्येतर प्राणियों में ध्यान की सर्वोच्चता संभव नहीं है और ध्यान का अप्रशस्तरूप भी इतना स्पष्ट अभिव्यक्त नहीं होता। यहां ध्यान से प्रशस्त शुभ ध्यान का अभिप्रायः है। लेकिन अप्रशस्त-अशुभ भी ज्ञेय है। अप्रशस्त का त्याग प्रशस्त को स्वतः उजागर कर देता है।
अप्रशस्त-अशुभ ध्यान दो हैं-आर्त्त और रौद्र। आर्त्त का अर्थ है-दुःखित होना। चेतना की बहिर्गामी प्रवृत्ति दुःख उत्पन्न करती है। प्राणियों का बाहर से सम्बन्धित होना दुःख है। ये दोनों अज्ञान-जनित हैं। अज्ञान के कारण ही प्राणी दूसरों को स्व मानते हैं। वियोग और संयोग से प्रसन्न तथा अप्रसन्न बनते हैं। जब जीवन पर निर्भर हो तब अशांति न हो यह कैसे शक्य हो सकता है? आर्त्त ध्यान के कारणों से यह स्पष्ट हो जाता है-
(१) प्रिय वस्तु के वियोग से होने वाला मानसिक कष्ट।
(२) अप्रिय वस्तु के संयोग से उत्पन्न चित्त कदर्थन ।
(३) रोग-शमन की आकांक्षा।
(३) ऐहिक तथा पारलौकिक विषयों की लोलुपता ।
साधारण तथा व्यक्त या अव्यक्त रूप से समस्त प्राणी-जगत् में इनका दर्शन होता है। वशिष्ठ जैसे ऋषि भी पुत्र शोक में विह्वल हो जाते हैं। लक्ष्मण ने यह देखकर राम से पूछा वशिष्ठ को कैसे शोक है? राम कहते हैं-लक्ष्मण इसमें क्या आश्चर्य है? जिसे ज्ञान है उसे अज्ञान भी है। तुम ज्ञान और अज्ञान दोनों के पार जाओ। कांटे से कांटा निकाला जाता है और फिर दोनों को फेंक दिया जाता है। प्रिय-वियोग की यह स्थिति है, वैसे ही अप्रिय-संयोग की है। जो हम नहीं चाहते. उसका मिलन भी विषाद उत्पन्न करता है। रोग जीवैषणा पर प्रहार है, अप्रिय है। उसे भी समत्वपूर्वक सहना कठिन है। बड़े-बड़े व्यक्तियों का धैर्य विचलित हो जाता है। विषयों के आकर्षण और विकर्षण-यह चाहिए और यह नहीं चाहिए की व्यथा भी क्या कम है ?
रौद्र ध्यान
रौद्र शब्द का अर्थ है-क्रूरता। जिसका आशय-चित्त क्रूर होता है, जो प्रतिशोध का भाव रखता है, हिंसा की भाव-धारा सतत बहती रहती है, दूसरों को गिराने, कुचलने में जिसे रस रहता है। असत्य, चोरी, संग्रह, दूसरों को ठगने में जो कुशल होता है, वह रौद्र ध्यान का अधिकारी है। इसमें चित्त की भयंकर विलक्षणता रहती है। मनुष्य अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए क्या अकार्य आज नहीं करता ? आजीविका के लिए जिन अनैतिक कार्यों की बात सुनते हैं, पढ़ते हैं वह सब धनलिप्सा का क्रूरतम परिणाम है। इसी प्रकार राजनैतिक क्षेत्र में सत्ता को बनाये रखने के लिए, तथा उसे समाप्त करने के लिए अनवरत चिंतन और निकृष्टतम उपायों का प्रयोग क्या चित्त की कलुषता के द्योतक नहीं हैं?
असत्य के लिए हिटलर प्रसिद्ध है, जिसने एक सूत्र का प्रयोग किया और कहा-'एक झूठ को बार-बार दोहराने से वह भी सत्य जैसा प्रतीत होने लगता है।' झूठ कैसे बोलना ? हिंसा कैसे करनी ? चोरी का आयोजन कैसे करना ? आदि-आदि प्रवृत्तियों में जो चिंतन, एकाग्रता है वह सब रौद्र ध्यान का परिणाम है। इनमें परिणामों की क्लिष्टता अनवरत चलती रहती है। वह शांत नहीं होती। एक पिता मरणासन्न था। पुत्र पास खड़े थे। उसने कहा बस एक इच्छा है। क्या तुम उसे पूरी करोगे? वचन दो। पिता की प्रवृत्ति से सब परिचित थे। सब मौन खड़े रहे। सबसे छोटे पुत्र ने कहा-पिताजी, कहिए, मैं पालन करूंगा। पिता ने कहा-मेरे मरने पर शरीर के टुकड़े कर थाने में सूचना देना कि अमुक पड़ोसी ने मेरे पिता को जीवित अवस्था में शांति से नहीं रहने दिया और मरने पर भी उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले।