प्रेक्षाध्यान कार्यशाला का आयोजन

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पूर्वांचल कोलकाता।

प्रेक्षाध्यान कार्यशाला का आयोजन

आचार्यश्री महाश्रमण जी के सुशिष्य मुनि जिनेश कुमार जी ठाणा 3 के सान्निध्य में पूर्वांचल प्रेक्षावाहीनी के तत्वावधान में प्रेक्षा ध्यान कार्यशाला का आयोजन हुआ। जिसमें 40 से अधिक संभागी थे। इस अवसर पर मुनि जिनेशकुमार ने कहा- जैन साधना पद्धति में तपोयोग का महत्त्वपूर्ण स्थान है। तपोयोग का एक प्रकार है- ध्यान । ध्यान साधनानवनीत है। पूर्वाजित कर्म को क्षय का अचूक उपाय ध्यान शक्ति है। ध्यान से शारीरिक, मानसिक भावनात्मक स्वास्थ्य को प्राप्त कर सकते हैं । ध्यान स्वभाव परिवर्तन की प्रक्रिया है । ज्ञान चंचल है ध्यान स्थित है। ध्यान यज्ञ है। ध्यान निर्विचारता की स्थिति है। ध्यान में एक ध्यान प्रेक्षा ध्यान है। प्रेक्षा ध्यान का अर्थ को गहराई से देखना। हम दूसरे को देखते हैं। लेकिन दूसरों को देखने की बजाय अपने आप को देखना ही सही है। मुनिने आगे कहा प्रेक्षाध्यान हमारे प्राचीन ग्रंथों, आधुनिक विज्ञान और अनुभव का समन्वय है। प्रेक्षाध्यान हमारे विचारों और चेतना को शुद्ध करने का अभ्यास है, तथा आत्मसाक्षात्कार की एक प्रक्रिया है। प्रेक्षाध्यान केवल आंख मूदने की प्रक्रिया नही बल्कि खोलने की प्रक्रिया है। प्रेक्षाध्यान के चार चरण है कायोत्सर्ग, अन्तयात्रा, श्वासं प्रेक्षा, ज्योति केन्द्र प्रेक्षा । ध्यान से पूर्व की तैयारी में आसन, मुद्रा संकल्प का भी अपना महत्व होता है। कायोत्सर्ग प्रेक्षा ध्यान की पृष्ठभूमि है। अंतर्यत्राता का जागरण का उपाय में श्वासप्रेक्षा। एकाग्रता का आधार है ज्योति केन्द्र से शीतलता प्राप्त होती है। मुनिने प्रेक्षाध्यान के प्रयोग कराया। मुनि परमानंदजी, मुनि कुणाल कुमारजी ने क्रमश: विचार व गीत प्रस्तुत किया। स्वागत भाषण ममता मूथा ने किया।