प्रेरणा स्रोत हैं चन्दनबाला

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साध्वी नीति प्रभा, हिसार

प्रेरणा स्रोत हैं चन्दनबाला

मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है। निज का उत्थान-पतन उसके अपने ही वश की बात है। यह तथ्य जितना सच है, उतना ही यह भी सही है कि उसके ऊपर वातावरण का भी प्रभाव पड़ता है। साथ ही यह भी सच है कि बुरे वातावरण में रहकर कदाचित ही कोई अपनी विशिष्टता बना सकता है। वास्तव में देखा जाए तो समर्थ लोगों के क्रिया-कलाप ही वातावरण बनाते हैं। शासनश्री साध्वी चन्दनबाला जी एक ऐसी ही सक्षम और समर्थवान साध्वी थीं। आप धुन की पक्की थीं। शुद्ध वातावरण बनाए रखने की उनमें विशेष कला थी। उन्होंने अपने भाग्य की पोथी लिखने के लिए विनम्रता, सहजता, सरलता और श्रमनिष्ठा को अपनी लेखनी बनाया। इतना ही नहीं, उनके पास रहने वाली नव-दीक्षित साथियों को भी वे पूरे मनोयोग से विकास का खुला मैदान देती थीं, ताकि वे पूरे मनोभाव से उस मैदान में उतरकर विजय प्राप्त कर सकें और अपने आपको सक्षम व मजबूत बना सकें।
सन् 2003 में मेरी दीक्षा हुई। दीक्षा लेने के कुछ समय बाद मेरे पैर के पंजे का मांस कट जाने के कारण मुझे गुरुदेव जलगाँव नहीं लेकर पधारे। उसी समय साध्वी चन्दनबाला जी का ऑपरेशन हुआ था, इस कारण वे भी साथ नहीं गईं। मुझे 'पाड़ियों' (सेवा हेतु रुकने वाले) का कहकर उनके पास रख दिया गया। साध्वी चन्दनबाला जी का ज्ञान के प्रति विशेष अनुराग था। आप प्रेरणा देतीं कि 'देखो, गुरुदेव के दर्शन हों तब तक तुम्हें उत्तराध्ययन (वरावैआलियं) पूरा कंठस्थ करना है।' वे रोज सुबह लगभग तीन बजे उठकर कंठस्थ करवातीं और सुनतीं। मुझे गीतिका, कविता बनाने व बोलने का भी अभ्यास करवातीं। उन्होंने केवल ज्ञान का ही विकास नहीं करवाया, बल्कि कलाओं में भी मुझे निष्णात बना दिया। आप अपनी कला को दूसरों में बाँटकर बहुत प्रसन्न होती थीं। सिलाई, रंगाई का काम भी कुछ ही समय में मुझे सिखा दिया। मैं मानती हूँ कि आज यह कार्यक्षमता उनकी ही देन है, जो मेरे जीवन की धरोहर बन गई है।
आपका वात्सल्य भाव तो बड़ा ही बेजोड़ था। प्रसंग लाडनूँ का है। गुरुदेव के दर्शन होने के बाद साध्वी प्रमुखा श्री कनकप्रभा जी ने फरमाया—'साध्वी नीतिप्रभा जी को हमने पाड़ियों में रुकने के लिए कहा था, अब उन्हें वापस ले रहे हैं।' चन्दनबाला जी ने निवेदन किया—'इन्हें हमारे पास ही रहने दो।' जब शासन माता ने मुझे उनके पास रखने से मना कर दिया, तो आप मेरे पास आईं और कहा—'नीतिप्रभा जी, साध्वी प्रमुखा श्री जी तुम्हें वंदना के लिए बुलाना चाहती हैं। तुम जाओ और महाराज को निवेदन कर दो कि मैं तो साध्वी चन्दनबाला जी के पास ही रहूँगी।' मैंने पूछा—'आपने निवेदन क्यों नहीं किया?' आपने कहा—'मैंने मना किया था, पर महाराज तुम्हें माँग रहे हैं। यदि तुम स्वयं मना करोगी तो तुम्हें कहीं नहीं भिजवाएँगे।'
मैंने निवेदन किया कि यदि महाराज आपका निवेदन मान जाते तो अच्छा होता, अन्यथा मुझे तो जहाँ गुरुदेव भेजेंगे, वहीं जाने का भाव है। मैं अपने मन से कभी नहीं कहूँगी कि मुझे कहाँ रहना है। उन्होंने मुझे बहुत समझाया। उनके नेत्र सजल हो गए। उनके भावों से साफ झलक रहा था कि उनका मुझ पर कितना वात्सल्य और कृपा भाव है। सूरत में मुझे मलेरिया हुआ और वह बिगड़ गया। लगभग चार-चार माह तक बुखार आने लगा। आपने जो मेरी सेवा की और करवाई, वह मेरे लिए प्रेरणा स्रोत बन गई कि सेवा कैसे करनी चाहिए। न जाने आपने कितने ही जीवन संस्कारों से निर्मित किए होंगे। वास्तव में ऐसी महान आत्मा के लिए मैं आभारी हूँ और रहूँगी।
होऊँ नहीं कृतघ्न कभी मैं, नहीं मुझमें किसी के अवगुण आवें।
गुण-ग्राम का भाव रहे नित्य, जीवन चन्दन बन महकावे।।