रचनाएं
दीक्षा की स्वीकार
गुरु तुलसी मुख कमल से, दीक्षा की स्वीकार।
महाश्रमण युग में किया, अपना बेड़ापार।।
जन्मी छातर गाँव में, चन्दनबाला नाम।
गुरु सेवा में रत सतत, जीवन था अभिराम।।
शासन माता की सखी, मिलनसार दिलदार।
राज गोचरी हित सदा, रहती थीं तैयार।।
शासनश्री से अलंकृता, गण भक्ति में लीन।
वर्धमान कुंदन सती, दीक्षित घर के तीन।।
संथारा कर अंत में, शहर अहमदाबाद।
चली गईं सुरलोक में, छोड़ सुनहरी याद।।
सभा सुधर्मा में स्मरण, करते बारम्बार।
विविध कलाओं में निपुण, उज्ज्वल था आचार।।
करके उत्तम साधना, शीघ्र वरें शिवद्वार।
कमल हृदय की भावना, करें आप स्वीकार।।