तृष्णा का कोई अंत नहीं, संतोष ही शांति का एकमात्र मार्ग  : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 21 अप्रैल, 2026

तृष्णा का कोई अंत नहीं, संतोष ही शांति का एकमात्र मार्ग : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अष्ट गणी संपदा से सुशोभित आचार्य श्री महाश्रमणजी ने चतुर्विध धर्मसंघ को संबोधित करते हुए 'तृष्णा की दुष्पूरता' विषय पर गंभीर आध्यात्मिक बोध प्रदान किया। उत्तरज्झयणाणि आगम का संदर्भ देते हुए आचार्यश्री ने फरमाया कि मानवीय वृत्तियाँ ही उसके कार्यों की दिशा तय करती हैं। यदि मन में सद्वृत्ति है तो व्यक्ति सत्कर्म करता है, किंतु दुर्वृत्तियों के वशीभूत होकर वह हिंसा और चोरी जैसे अपराधों के दलदल में फंस जाता है।
लोभ: अंत तक पीछा न छोड़ने वाली बुराई :
प्रवचन के दौरान आचार्यश्री ने सूक्ष्म दार्शनिक तथ्यों को स्पष्ट करते हुए फरमाया कि राग और द्वेष ही समस्त दुर्वृत्तियों के मूल हैं। क्रोध, मान और माया जैसे विकार नौवें गुणस्थान तक शांत हो जाते हैं, लेकिन 'लोभ' एक ऐसी दुर्वृत्ति है जो दसवें गुणस्थान तक आत्मा का पीछा नहीं छोड़ती। उन्होंने सचेत किया कि तृष्णा की अग्नि को संसार की संपूर्ण धन-संपदा से भी नहीं बुझाया जा सकता। शास्त्रानुसार आत्मा 'दुष्पूर' है, जिसे केवल संयम से ही भरा जा सकता है।
संतोष का महत्व और गृहस्थ धर्म:
आचार्य प्रवर ने फरमाया, 'ज्यों-ज्यों लाभ होता है, त्यों-त्यों लोभ बढ़ता है।' इस चक्र को केवल संतोष का अवरोध ही तोड़ सकता है। पूज्य प्रवर ने स्पष्ट किया कि- साधु जीवन: पूर्ण अपरिग्रह का प्रतीक है, जिसकी महत्ता के आगे समस्त संसार नतमस्तक होता है।
गृहस्थ जीवन: गृहस्थों के लिए परिग्रह अनिवार्य हो सकता है, किंतु उन्हें भी भोगों का अल्पीकरण (कमी) कर संतोष धारण करने का निरंतर प्रयास करना चाहिए।
प्रेक्षाध्यान और अन्य आध्यात्मिक गतिविधियाँ:
मंगल प्रवचन के पश्चात पूज्य प्रवर ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं का समाधान किया। साथ ही, प्रेक्षाध्यान शिविर के साधकों को 'उपसंपदा' प्रदान कर उन्हें आध्यात्मिक पथ पर आगे बढ़ने का संकल्प दिलाया।
कार्यक्रम में साध्वी सूर्ययशाजी ने अपने विचार रखे।
साध्वी निर्मलयशाजी और साध्वी गवेषणा श्री जी ने अपनी सहवर्ती साध्वियों के साथ सुमधुर गीतों का संगान किया, जिससे वातावरण भक्तिमय हो गया। अंत में आचार्यश्री ने सभी को मंगल प्रेरणा प्रदान कर संयम के मार्ग पर चलने का आह्वान किया।