विकारों के बीच भी चित्त को शांत रखना ही असली धैर्य : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 18 अप्रैल, 2026

विकारों के बीच भी चित्त को शांत रखना ही असली धैर्य : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने जैन धर्म के पुनर्जन्म सिद्धांत पर प्रकाश डालते हुए फरमाया कि वर्तमान जीवन एक पड़ाव है। जब तक मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती, आत्मा को आगे का जन्म लेना ही पड़ता है। उन्होंने सचेत किया कि जो लोग धर्म को त्यागकर अधर्म के मार्ग पर चलते हैं, वे दुर्गति को प्राप्त होते हैं, जबकि धीर, वीर और गंभीर पुरुष अपनी आत्मा को ऊंचाइयों तक ले जाते हैं।
धीरता : बुद्धि और अविचलित मन का संगम :
सुधर्मा सभा में चतुर्विध धर्मसंघ को पावन पाथेय प्रदान करते हुए आचार्यश्री ने 'धीर' शब्द की तात्विक व्याख्या की। पूज्य प्रवर ने फरमाया :
'धीर वह है जो न केवल बुद्धिमान हो, बल्कि प्रतिकूल परिस्थितियों और परीषहों (कष्टों) में भी अविचलित रहे। असली धीर पुरुष वे हैं जिनके समक्ष विकार के निमित्त उपस्थित होने पर भी चित्त विकृत नहीं होता और वे शांति बनाए रखते हैं।'
स्मृति और ज्ञान का दोहरान आवश्यक :
साधु-साध्वियों को संबोधित करते हुए आचार्यप्रवर ने ज्ञानार्जन के सूत्रों पर चर्चा की। आचार्य श्री ने फरमाया कि बुद्धि एक उपलब्धि है, लेकिन उसका सही उपयोग समस्याओं के समाधान में होना चाहिए। उन्होंने युवा पीढ़ी को प्रेरित किया कि लगन और पुरुषार्थ से ज्ञान को कंठस्थ करें। साथ ही यह निर्देश दिया कि कंठस्थ किया गया ज्ञान स्मृति में बना रहे, इसके लिए समय-समय पर उसका दोहरान (रिवीजन) करना अत्यंत आवश्यक है।
शिक्षण-प्रशिक्षण के बाद होगी
परीक्षा :
'योगक्षेम वर्ष' के अंतर्गत चल रहे शिक्षण कार्यक्रमों पर चर्चा करते हुए आचार्यश्री ने फरमाया कि केवल शिक्षण पर्याप्त नहीं है, उसकी समीक्षा और परीक्षा भी अनिवार्य है। युगप्रधान ने आगामी परीक्षाओं के संदर्भ में योजना और व्यवस्था की जानकारी चारित्रात्माओं को प्रदान की। प्
रवचन के अंतिम चरण में पूज्य प्रवर ने उपस्थित साधु-साध्वियों की आध्यात्मिक जिज्ञासाओं का समाधान भी किया।