गुरुवाणी/ केन्द्र
अहिंसा पर आधारित है साधु की चर्या, पग-पग पर हो यत्नाचार : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अमृत देशना प्रदान करते हुए साधु जीवन में 'समिति' और 'अहिंसा' के सूक्ष्म अंतर्संबंधों पर प्रकाश डाला।
आचार्यश्री ने फरमाया कि साधु चर्या के विधि-विधानों का मूल आधार अहिंसा ही है।
कौन है 'समित'?:
आगमों का हवाला देते हुए आचार्यश्री ने फरमाया कि 'समित' वह है जो पांच समितियों से युक्त हो। उन्होंने विस्तार से समझाते हुए कहा, 'आगम के अनुसार जो प्राणों का अतिपात नहीं करता, जीव हिंसा से बचता है और अपनी प्रवृत्तियों को सम्यक् (सही) रखता है, वही समित कहलाता है। ऐसे समित साधु की आत्मा से पापों का क्षरण होता है।
पांच समितियां और यत्नाचार:
आचार्यश्री ने साधु जीवन की पांच समितियों की व्याख्या करते हुए अहिंसा के दर्शन कराए:
ईर्या समिति : देख-देखकर चलना और भाव क्रिया (चित्त की एकाग्रता) के साथ गमन करना।
भाषा समिति : कटु और दोषपूर्ण भाषा का त्याग। तेरापंथ मर्यादा के अनुसार, साधु-साध्वियों को खुले मुंह न बोलने और आहार के समय पूर्ण मौन रखने का निर्देश दिया गया है।
एषणा समिति : साधु अपने निमित्त बना भोजन ग्रहण नहीं करते, यह भी अहिंसा का ही रूप है।
प्रमार्जन व उत्सर्ग : बैठने से पूर्व स्थान की शुद्धि और अपशिष्ट के विसर्जन में भी जीवों की रक्षा का पूरा ध्यान रखा जाता है।
सावधानी और आलोचना:
१. तीन करण और तीन योग : साधु मन, वचन और काय
(योग) से तथा करना, कराना और अनुमोदन (करण) से हिंसा का त्याग करता है।
२.जागरूकता : अंधेरे में चलना हो या बैठने की क्रिया हो, हर जगह प्रमार्जन (सफाई) आवश्यक है।
३. प्रायश्चित : यदि भूलवश कोई क्रिया मर्यादा के विरुद्ध हो जाए, तो उसकी 'आलोचना' (स्वीकारोक्ति और शुद्धि) करना अनिवार्य है।