गुरुवाणी/ केन्द्र
मनुष्य जन्म की 'मूल पूंजी' को पापों में न गंवाएं : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के अखण्ड परिव्राजक आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से जीवन की सार्थकता का बोध कराया। पूज्य प्रवर ने फरमाया कि मनुष्य जन्म एक ऐसी मूल पूंजी है, जिसे पाकर भी यदि व्यक्ति व्यसनों और कुसंगति में समय नष्ट करता है, तो वह अपनी पूंजी को पूरी तरह खो देता है। बुद्धिमत्ता इसी में है कि हम धर्म और तपस्या के माध्यम से इस जन्म को देवगति और मोक्ष की ओर ले जाएं।
आप किस श्रेणी में हैं? स्वयं चिंतन करें :
आचार्यश्री ने मनुष्य की तीन श्रेणियों का वर्णन करते हुए चतुर्विध धर्मसंघ को चिंतन की प्रेरणा दी:
पूंजी गंवाने वाला : जो पाप और व्यसनों में रहकर नरक या तिर्यंच गति को प्राप्त होता है।
स्थिर रहने वाला : जो न अधिक पाप करता है न धर्म, वह पुनः मनुष्य गति में आता है।
पूंजी बढ़ाने वाला: जो साधुत्व या श्रेष्ठ श्रावक जीवन अपनाकर धर्म की कमाई करता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
साधुत्व और सेवा: धर्म की असली कमाई :
साधु और समणी वृंद को संबोधित करते हुए पूज्य प्रवर ने फरमाया कि हमें जो संयमित जीवन मिला है, वह बहुत ऊँची भूमिका है। द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव के अनुसार स्वाध्याय, तपस्या और वृद्ध-रोगी सेवा में तत्पर रहना ही असली साधना है। उन्होंने सरलता, क्षमा, आर्जव और मार्दव जैसे गुणों को जीवन में उतारने पर बल दिया।
गृहस्थों के लिए जीवन का चतुर्थांश सूत्र :
गृहस्थों को मार्गदर्शन देते हुए आचार्यश्री ने जीवन के तीन महत्वपूर्ण चरणों को रेखांकित किया:
प्रथम 25 वर्ष : विद्यार्जन (ज्ञान की प्राप्ति) के लिए। द्वितीय चरण : धनार्जन (आजीविका) के लिए।
तृतीय चरण : धर्मार्जन (आध्यात्मिक उन्नति) के लिए।
पूज्य प्रवर ने विशेष रूप से फरमाया कि धर्म के कार्य को वृद्धावस्था के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि उस समय शरीर कठिन परिश्रम के योग्य नहीं रहता।
खमत-खामणा से महका सुधर्मा सभा परिसर : प्रवचन के उपरांत आध्यात्मिक सौहार्द का दृश्य देखने को मिला। आचार्यश्री की अनुज्ञा से साध्वी राजीमतीजी
ने संतवृंद से 'खमत-खामणा' (क्षमा याचना) की। इसके उत्तर में संतवृंद की ओर से मुनि धर्मरुचिजी ने साध्वी वृंद के प्रति मंगलकामनाएं व्यक्त कीं।