प्रामाणिकता ही अचौर्य महाव्रत की आत्मा : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 16 अप्रैल, 2026

प्रामाणिकता ही अचौर्य महाव्रत की आत्मा : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के महातपस्वी, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अचौर्य महाव्रत की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए फरमाया कि एक विद्वान साधु का जीवन पांच महाव्रतों—अहिंसा, सत्य, अस्तेय (अचौर्य), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह के प्रति सजग रहना चाहिए। पूज्य प्रवर ने विशेष बल देते हुए फरमाया कि साधु के अवचेतन में यह भाव स्थिर होना चाहिए कि उसका हर आचार और संस्कार साधुता से ओत-प्रोत हो।
आचार्य भिक्षु का 300वां जन्म वर्ष :
एक पावन पुनरावृत्ति
सुधर्मा सभा में पावन देशना प्रदान करते हुए आचार्यप्रवर ने फरमाया कि वर्तमान में तेरापंथ धर्मसंघ के आद्य अनुशास्ता आचार्य भिक्षु का 300वां जन्म वर्ष 'भिक्षु चेतना वर्ष' के रूप में मनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह सौभाग्य की पुनरावृत्ति है, जो पूर्व में आचार्य तुलसी के समय भी हुई थी। आचार्य भिक्षु के तात्विक साहित्य का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि छः काय के जीवों को अभयदान देना ही वास्तविक धर्म है।
अचौर्य की कसौटी : आज्ञा और मर्यादा :
अनुशासन पर्व पर अमृत देशना फरमाते हुए युगप्रधान आचार्यश्री ने फरमाया कि साधु का चित्त प्रामाणिकता से भावित रहना चाहिए। उन्होंने अचौर्य महाव्रत को स्पष्ट करते हुए कहा:
'साधु की साधना इतनी प्रबल हो कि वह बिना पूछे किसी वस्तु को ग्रहण न करे। किसी के घर ठहरना हो या औषधि सेवा लेनी हो, हर कार्य आज्ञा और मर्यादा के अधीन होना चाहिए। अचौर्य की असली आत्मा उसकी प्रामाणिकता में ही बसती है।'
हाजरी वाचन और चारित्रिक निर्मलता की प्रेरणा :
चतुर्दशी के अवसर पर आचार्यश्री ने 'हाजरी' और 'मर्यादा पत्र' का वाचन किया। उन्होंने साधु-साध्वियों, समणियों को प्रेरित करते हुए कहा कि भीषण गर्मी को समता भाव से सहें। नंगे पांव चलने और खान-पान में जमींकंद के त्याग जैसे नियमों के प्रति जागरूकता ही निर्जरा का मार्ग प्रशस्त करती है। उन्होंने प्रतिक्रमण को पूर्ण सजगता के साथ करने का निर्देश दिया।
लेख पत्र का उच्चारण और मंगल कृपा :
गुरुदेव की आज्ञा से साध्वी पदमप्रभाजी ने लेख पत्र का उच्चावरण किया, जिस पर प्रसन्न होकर आचार्यश्री ने उन्हें सात कल्यायक बख्शीश स्वरूप प्रदान किए।
इसके पश्चात उपस्थित समस्त चारित्रात्माओं ने अपने-अपने स्थान पर खड़े होकर सामूहिक रूप से लेख पत्र का उच्चारण किया और संयम पथ पर दृढ़ रहने का संकल्प दोहराया।