गुरुवाणी/ केन्द्र
थोड़े भौतिक लाभ के लिए आत्मिक खजाना न लुटाएं :आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के अधिशास्ता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी के पावन सान्निध्य में जैन विश्व भारती के 'योगक्षेम वर्ष' के कार्यक्रम पूरी दिव्यता के साथ गतिमान हैं। सुधर्मा सभा में आयोजित मुख्य प्रवचन कार्यक्रम का शुभारंभ आचार्यप्रवर द्वारा प्रदत्त मंगल महामंत्र के साथ हुआ। तत्पश्चात साध्वीवृंद ने सुमधुर स्वर में प्रज्ञागीत का संगान किया और आचार्यश्री ने उपस्थित जनमेदनी को ध्यान का प्रयोग करवाया।
‘थोड़े के लिए - बहुत मत खोओ’:
मुख्य विषय पर पावन पाथेय प्रदान करते हुए युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने फरमाया कि थोड़े से लाभ के लिए बहुत कुछ गँवा देना गहरी नासमझी है। उन्होंने जीवन में विवेक और चातुर्य की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा:
'मनुष्य को वही कार्य करना चाहिए जिसमें केवल लाभ हो, या फिर लाभ अधिक और नुकसान कम हो। लेकिन जहाँ लाभ नाममात्र का हो और नुकसान बहुत बड़ा हो, वह कार्य बुद्धिमानी नहीं है।
साधना और भौतिक कामना का द्वंद्व :
आचार्यश्री ने साधना पथ का उदाहरण देते हुए समझाया कि यदि कोई साधक वर्षों की तपस्या और महाव्रतों के पालन के पश्चात, किसी भौतिक सुख (जैसे चक्रवर्ती या वासुदेव बनने की कामना) की इच्छा कर 'निदान' कर लेता है, तो वह अपनी अनमोल साधना को कौड़ियों के भाव बेच देता है। यह आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत बड़ा नुकसान है।
ज्ञान, दर्शन और चारित्र की सुरक्षा:
प्रवचन के अंत में आचार्यप्रवर ने संदेश प्रदान किया कि आत्मा के कल्याण के लिए ज्ञान, दर्शन और चारित्र रूपी खजाना सुरक्षित रहना चाहिए। थोड़े से भौतिक सुखों के लोभ में आकर इस आत्मिक संपदा को लुटाना विचार की मूढ़ता है। अतः हर व्यक्ति को अपनी समझदारी और बुद्धिमत्ता को आध्यात्मिक उन्नति में लगाना चाहिए।
अणुव्रत पर विशेष उद्बोधन :
मुख्य प्रवचन के पश्चात मुख्य मुनिश्री महावीरकुमारजी ने अणुव्रत के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अणुव्रत की प्रासंगिकता बताते हुए उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं की जिज्ञासाओं का समाधान भी किया।