अनंत से अनंत की यात्रा

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निखिल बांठिया, बैंगलोर

अनंत से अनंत की यात्रा

पाँच सितंबर, 2025—वह पावन दिन।
अहमदाबाद की पुण्य भूमि पर सत्रह मुमुक्षु आतुर खड़े थे—गुरुदेव आचार्य श्री महाश्रमण जी के कर-कमलों से अगार धर्म से आगे बढ़कर, अनगार धर्म को स्वीकार करने हेतु। संयममय जीवन को अंगीकार कर मुनि बनने की उत्कंठा उनके अंतर्मन में स्पंदित हो रही थी। दीक्षा स्वीकार कर अपने जीवन-पथ को मोक्ष की दिशा में मोड़ देने का दृढ़ संकल्प लिए वे उपस्थित थे।
ऐसे में प्रत्येक मुमुक्षु अपने मनोभावों को गुरुदेव के चरणों में अर्पित कर रहे थे—अपनी दीक्षा के हेतु, अपने लक्ष्य और अपने संकल्प को सबके समक्ष साझा कर रहे थे। इसी क्रम में अब बारी आई बैंगलोर से आए मुमुक्षु प्रीत कुमार की। अपने वक्तव्य की शुरुआत करते हुए उन्होंने कहा—
'अनंत को तोड़कर अनंत को पाना है।'
अनंत—सुनने में यह एक अत्यंत छोटा-सा शब्द प्रतीत होता है, परंतु जब इसकी गहराई से समीक्षा की जाती है, तो इसी एक शब्द में समस्त लोक समाहित दिखाई देता है। यह अनंत प्रत्येक जीव की इस लोक में चल रही अनादि यात्रा से जुड़ा हुआ है। हर जीव न जाने कितने सैकड़ों कालचक्रों से इस संसार में भ्रमण कर रहा है—अनंत जन्म और अनंत मरण की इस यात्रा से वह थक चुका है, तृप्त हो चुका है; फिर भी इस अनंत को तोड़ पाने में स्वयं को असमर्थ पाता है।
प्रश्न यह है कि सब कुछ जानते हुए भी, जन्म-मरण की इन परंपराओं से पूर्णतः अवगत होने पर भी, वह जीव इस चक्र—इस चक्रव्यूह—से बाहर क्यों नहीं निकल पा रहा है? इसका एक अत्यंत गहरा और मूल कारण है—बंधन।
परंतु क्या है यह बंधन? बंधन का अर्थ अत्यंत सूक्ष्म है। यह बंधन केवल परिवार से नहीं है, न इस सांसारिक जीवन से, न ही घर-परिवार या धन-वैभव से। वास्तविक बंधन तो उन अनंत जन्म-मरण से चले आ रहे कर्म-पुद्गलों का है, जिनके कारण जीव आज भी इस जन्म-मरण की परंपरा से ग्रस्त बना हुआ है।
तो अंततः प्रश्न उठता है—ये बंधन होते ही क्यों हैं? कर्म-पुद्गलों का आत्म-प्रदेशों के साथ ऐसा गहन बंधन आखिर बनता कैसे है? क्या कारण है कि ये कर्म-पुद्गल आत्म-प्रदेशों से चिपक जाते हैं? और एक बार चिपक जाने के पश्चात् भी उनसे निवृत्त होना इतना कठिन क्यों प्रतीत होता है? ऐसा क्या है कि अनंत काल से जीव इन कर्म-पुद्गलों से आबद्ध ही चला आ रहा है?
मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग—ये पाँच आश्रव इसके प्रमुख कारण हैं। इन्हीं के कारण कर्म-पुद्गल निरंतर आत्म-प्रदेशों से चिपकते चले जाते हैं। जब तक ये आश्रव सक्रिय रहते हैं, तब तक कर्मों का प्रवाह रुकता नहीं और जीव अनजाने ही नए-नए बंधनों का निर्माण करता रहता है।
इसी अनंत को तोड़ना आवश्यक है—क्योंकि अनंत कालचक्र से, अनंत जन्म-मरण की परंपरा के साथ जो बंधन जीव के साथ चले आ रहे हैं, उन्हें तोड़े बिना मुक्ति संभव नहीं। ये बंधन भले ही बहुत लंबे समय से जुड़े हुए हों, परंतु इनसे पूर्णतः मुक्त हुए बिना जीव न तो परम सुख की अनुभूति कर सकता है और न ही परम मोक्ष की प्राप्ति।
तो अब यह स्पष्ट होता है कि बंधन—चाहे वे कर्म-पुद्गलों के हों, चाहे अनंत काल से चले आ रहे कर्म-पुद्गलों के ही क्यों न हों—शाश्वत नहीं हैं। तब प्रश्न उठता है कि एक जीव की जीवन-यात्रा में शाश्वत क्या है?
इसी संदर्भ में आलंबनसूत्र का एक सूत्र आता है—
एगो मे सासओ अप्पा, नाण-दंसण-संजुओ।
सेसा मे बाहिरा भावा, सव्वे संजोगलक्खणा॥
अर्थात् जीव की जीवन-यात्रा में यदि कुछ शाश्वत है, तो वह आत्मा है—जो ज्ञान और दर्शन से संयुक्त है। इसके अतिरिक्त जो कुछ भी है, वह बाह्य है, संयोगजन्य है और संयोग से ही नष्ट होने वाला है।
और इसी शाश्वत को पाने के लिए हमें भी उसी दिशा में प्रयत्न करना है, जिस दिशा में आज ये सत्रह मुमुक्षु अग्रसर हैं। अगार धर्म से आगे बढ़कर अनगार धर्म को स्वीकार करना, उसी दिशा में उठाया गया एक अत्यंत महत्वपूर्ण और निर्णायक कदम है। शाश्वत सत्ता हमारे भीतर ही विद्यमान है—ज्ञान और दर्शन की अनंत सत्ता के रूप में। उसी अनंत सत्ता को उपलब्ध कर, उसी में स्थित होकर ही जीव अनंत मोक्ष को स्वीकार कर सकता है और अनंत मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है।
गुरुदेव का जीवन स्वयं में साधना की एक सतत यात्रा है—जहाँ प्रत्येक क्षण संयम, प्रत्येक निर्णय त्याग और प्रत्येक श्वास आत्म-जागृति की दिशा में अग्रसर प्रतीत होता है। उनके जीवन में न केवल सिद्धांतों का वास है, बल्कि उन सिद्धांतों का सजीव आचरण भी है। अनंत जन्म-मरण की परंपरा से परे उठकर, आत्मा की शाश्वत सत्ता में स्थित रहने का जो मार्ग शास्त्रों में वर्णित है, वही मार्ग उनके जीवन में प्रत्यक्ष रूप से प्रतिबिंबित होता है। इस दृष्टि से उनका सम्पूर्ण जीवन ही ‘अनंत से अनंत की यात्रा’ का एक जीवंत उदाहरण बन जाता है। और इसी शाश्वत की प्राप्ति की दिशा में निरंतर अग्रसर रहने की प्रेरणा हमें अपने गुरुदेव के जीवन से मिलती है।
यदि ‘अनंत से अनंत की यात्रा’ को किसी जीवंत रूप में देखना हो, तो वह हमें उनके जीवन में सहज ही दृष्टिगोचर होती है। उनके जन्म दिवस, दीक्षा दिवस और आचार्य पद प्रतिष्ठा दिवस के इस पावन अवसर पर, यही भावना और भी प्रगाढ़ हो उठती है कि हम भी उनके चरणों में चलकर, उस अनंत की ओर अपने कदम बढ़ा सकें। आशा यही है कि हम भी इस अनंत से शाश्वत अनंत की यात्रा में सहभागी बन सकें।