रचनाएं
सारणा हो तो ऐसी
मुझे दीक्षा लिये कुछ महीने ही हुए थे। लम्बे-लम्बे विहारों से पैरों में छाले हो गए थे। एक दिन मैं साधन के साथ विहार करके आई। साध्वी प्रमुखा श्री जी के दर्शन किए तब आपने फरमाया, 'थोड़ा थक जाते होंगे ना? एक तो पैरों में छाले और साधन के साथ तेज चलना?' मैं मौन थी।
आपने मेरी मौन भाषा को पढ़ लिया और साध्वी शुभ्रयशा जी से कहा, 'इनको तो मेरे पास ही छोड़ दो'।
उन्होंने कहा— 'तहत्'। कुछ दिन बाद गुरुदेव ने फरमाया कि नव-दीक्षितों को साधन के साथ नहीं, हमारे साथ ही जाना है।
पहले दिन विहार किया, शाम को आहार नहीं भा रहा था। तब प्रमुखा श्री जी ने कहा, 'क्या हुआ? थोड़ा आहार क्यों कर रहे हो? ग्रुप की याद आ रही है?' मैंने कहा, 'ठीक नहीं लग रहा, सिर में भी दर्द हो रहा है'। फिर तापमान (Temperature) चेक किया तो 101 बुखार आया। प्रमुखा श्री जी ने फरमाया, 'तुम्हें जो रुचि हो वह आराम से बता देना, संकोच मत करना। ग्रुप वाले नहीं हैं तो हमें बता सकते हो'।
मैंने कहा— 'तहत्!'
आपने कृपा कराई और एक साध्वी जी को फरमाया कि मंथन प्रभा जी को प्रतिक्रमण सुना दें और फिर इन्हें सुला देना। आपने यह भी निर्देश दिया कि ठंड बहुत है, अतः गर्म कपड़े आदि का ध्यान रखा जाए। रात में भी 2-3 बार साध्वियों से पूछवाया कि उनकी तबीयत कैसी है? सुबह भी मुझसे पूछा कि अब कैसा लग रहा है? मैंने कहा, 'बुखार कम हुआ है, थोड़ा ठीक है'।
सुबह विहार करना था, तब आपने एक साध्वी श्री को कहा कि नवकारसी आते ही इनको कुछ खिला देना और जैसे इनके चलने में साता (सुविधा) हो, वैसे धीरे-धीरे लेकर आना। प्रमुखा श्री जी ने मेरा बहुत ध्यान रखा। इतनी ममता और इतना वात्सल्य केवल एक माँ ही अपने बच्चे को दे सकती है। जैसे माँ बच्चे को जन्म देती है, उसका पालन-पोषण करती है, उसे पढ़ाती-लिखाती है और उसका विकास चाहती है, वैसे ही दीक्षा लेकर मुझे नया जन्म मिला। समय-समय पर प्रमुखा श्री जी का वात्सल्य, शिक्षण और प्रशिक्षण मिलता रहता है।
चतुर्थ मनोनयन दिवस पर मैं आपके प्रति यही शुभकामना करती हूँ कि आप इसी तरह हम छोटी साध्वियों की सार-संभाल (रिछपाल) करती रहें और हम आपके इंगित की आराधना करते रहें।