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मेरे स्मृति पटल पर उमड़ रहा है 2012 का एक परिदृश्य
साध्वी प्रमुखा विश्रुतविभाजी की पहचान कुछ विलक्षण है। आप योग साधिका, गुरु दृष्टि आराधिका और भक्ति व समर्पण का त्रिवेणी संगम हैं। आपके कर्तृत्व और व्यक्तित्व में जिम्मेदारी का फौलादी पौरुष प्रकट हो रहा है। मेरी लेखनी चतुर्थ मनोनयन पर कुछ आलेखन करना चाह रही है।
आज मेरे स्मृति पटल पर उमड़ रहा है 2012 का एक परिदृश्य। पूज्यप्रवर का 2012 का चातुर्मास जसोल में था, उस समय आप मुख्य-नियोजिका पद को सुशोभित कर रहे थे। यही वह समय था जब अनेक बहिनों ने पा. शि. संस्था में प्रवेश किया। पा. शि. संस्था की मुमुक्षु बहिनों के शिक्षण-प्रशिक्षण का दायित्व आपके कंधों पर था।
आप उस वर्ष पूरी जागरूकता से मुमुक्षु बहिनों का पथदर्शन करते। अनेक छोटी-छोटी बहिनें संस्था में भर्ती हुई थीं, उनमें एक मैं भी थी। आप छोटी उम्र की बहिनों का विशेष ध्यान रखते। आप उन्हें अपने पास बिठाते, ज्ञान-ध्यान सिखाते, छोटी कहानियों व घटनाओं के माध्यम से उनमें संस्कारों का बीजारोपण करते। उनके अध्ययन व कंठस्थ में कैसे गति हो, इसकी समुचित व्यवस्था भी करते। मैंने अनुभव किया कि आप जब छोटी मुमुक्षु बहिनों के साथ बात करते तो उसमें कितना अपनापन होता। आपका जो असीम वात्सल्य प्राप्त हुआ, वह आज भी मस्तिष्क में चल-चित्र के समान घूम रहा है।
वर्तमान में भी हम छोटी-छोटी साध्वियां यह प्रत्यक्ष अनुभव कर रही हैं कि आप किस प्रकार हमारे निर्माण में अपना श्रम लगा रहे हैं और हमारे विकास का अनवरत चिंतन कर रहे हैं। ज्ञान, संस्कारों और साध्वाचार के छोटे-छोटे नियमों के प्रति हमें जागरूक रहने का समुचित प्रशिक्षण आप निरंतर देते रहते हैं।
आपके असीम वात्सल्य के साथ-साथ आपके जीवन का उज्ज्वल पक्ष—साधना का पक्ष—भी हमें सतत मूक प्रेरणा देता रहता है। आपके जीवन में साधना की गहराई है। सधी हुई साधना ही आपके जीवन का दर्शन है।
एक छोटी सी घटना ने मुझे आपके वात्सल्य और साधना के दोनों पक्षों का एक साथ अनुभव करा दिया। योगक्षेम वर्ष का भव्य अवसर था और साधु-साध्वियों की संख्या 350 तक पहुँच गई थी। सभी को संभालना साध्वी प्रमुखा का परम कर्तव्य है। इसी दौरान एक समय ऐसा आया जब साध्वी प्रमुखा श्री जी ने मुझे ग्रास (भिक्षा का अंश) नहीं बकसाया। मेरे मन में उथल-पुथल मच गई कि क्या मुझसे कोई गलती हो गई है। मेरे मन में आपके ग्रास के प्रति एक सहज आकर्षण रहता है।
कई दिनों तक ग्रास न मिलने पर मैं संकुचाते हुए आपकी सेवा में पहुँची। आपने पूछा— 'आज कैसे आना हुआ?' मैंने धीमे स्वर में निवेदन किया कि कई दिन हो गए आपने ग्रास नहीं दिया, क्या मुझसे कोई गलती हुई है? आपने वात्सल्यपूर्ण नयनों से निहारा और आश्वस्त करते हुए फरमाया— 'अभी बहुत साध्वियां हैं; कभी समाधिवरम् वाली साध्वियों को ग्रास देते हैं तो कभी अमृतायन् वाली साध्वियों को। गोचरी आने पर तुम्हें याद कर लेंगे। रही बात गलती की, तो मैं नाराज होकर क्या करूं? राग-द्वेष करने से तो मेरा ही कर्म बंधन होगा। मेरा लक्ष्य केवल गलती बताकर परिष्कार का प्रयत्न करना रहता है।'
इस छोटी सी घटना ने आपके साधना पक्ष को उजागर कर दिया। जो निरंतर अपने प्रति जागरूक रहते हैं, उनकी साधना सिद्धि को प्राप्त होती है। आपके आचार, विचार और व्यवहार में हर परिस्थिति में साधना झलकती है।
आपके चयन दिवस के उल्लासमय अवसर पर यही मंगलकामना है कि आपका वात्सल्य भरा वरदहस्त मेरे सिर पर सदा बना रहे। मैं आपके तेजस्वी साध्वी समाज के सपनों में रंग भरने का प्रयत्न करती रहूँ।