मनोनयन शुभ नयन का, विश्रुत मृदु व्यवहार

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साध्वी स्वर्णरेखा

मनोनयन शुभ नयन का, विश्रुत मृदु व्यवहार

मनोनयन शुभ नयन का, विश्रुत मृदु व्यवहार,
धैर्य स्थैर्य की आकृति, दिया प्रभु ने भार ॥
निर्मल काया पर अंकित, भाव शुद्धि का तेज,
सबके प्रति समत्व चिन्तन और हृदय में हेज ॥
कोमल भाव बिछे हैं दिल में, पास विविध विद्याएँ,
ज्ञान-प्रकाश दिखाती जाओ, मिट जाएँ दुविधाएँ ॥
नयन-प्यालियों से अमृत रस, युगों-युगों तक पाएँ,
चढ़ो कीर्ति के शिखरों पर, गौरव के शंख बजाएँ ॥
छंद-छंद में तेरी अर्चा, सांस-सांस में दृष्टि,
शब्द-अर्थ ज्यों गौरव गाएँ, यही है मेरी सृष्टि ॥
आज आपके मनोनयन पर, उर से सुर हैं निकले,
करूँ गुणों का वर्णन,
अपना सब कुछ अर्पण कर दूँ, करती रहूँ नमन ॥