रचनाएं
संघ क्षितिज पर मेघ धनुष यह नवरंगा उभरा है
संघ क्षितिज पर मेघ धनुष यह नवरंगा उभरा है।
साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभाजी का जीवन निखरा है ॥
साध्वी समुदाय हरा-भरा है, गीतों से मन भरा-भरा है ॥
चंदेरी की कीर्तिकौमुदी, मोदी कुल की ज्योति,
महाप्राण की जन्म धरा पर, निपजा उजला मोती।
लाड सती और कनकप्रभाजी की अभिराम धरा है ॥
(तेरापंथ की राजधानी वह सचमुच वसुंधरा है ॥)
प्रतिभा और प्रबंधन पटुता की नैसर्गिक क्षमता,
अनुशासन में भी अपनापन, व्यवहारों में मृदुता।
लहरों-सा उत्साही मानस, श्रुत वैभव गहरा है ॥
ध्यान योग, स्वाध्याय योग, कायोत्सर्ग का संगम,
साम्य योग है सधा हुआ, प्रेरक नियमित जीवन क्रम।
अपने पर अपना अनुशासन का प्रतिपल पहरा है ॥
योगीश्वर श्री महाप्रज्ञ की कृपा अनन्या पाई,
महाश्रमण ने दी साध्वीप्रमुखा पद की ऊंचाई।
गुरु करुणा से युग अनुरूप मिली साध्वी प्रवरा है ॥
स्वर्णिम हो हर प्रात आपका, रजतमयी हर रजनी,
जीओ वर्ष हजारों, स्वस्थ रहो, दो कृतियाँ वजनी।
वर्धापन करने नभ से कोई, ज्योतिपुंज उतरा है ॥
युगप्रधान की सन्निधि, नन्दनवन की सुषमा न्यारी,
अंतरंग परिषद की आभा है अतिशय मनहारी।
परितः प्रतिभा पारिजात का पुण्यपुंज बिखरा है ॥
लय – मांय न मांय...