महायोगी महात्मा : आचार्य महाश्रमण

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साध्वी अक्षयप्रभा

महायोगी महात्मा : आचार्य महाश्रमण

युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमणजी ने एक गीत में कहा है— 'साधना ही शान्ति का आधार है, योग विरहित जिंदगी बेकार है'
शान्ति हर मानव को चाहिए। शान्ति के स्रोत भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। बचपन, यौवन और वृद्धावस्था में शान्ति के विविध साधन व्यक्ति चाहता है। शाश्वत, स्थायी शान्ति के लिए योग ही एक मात्र साधन प्रतीत होता है।
योगाचार्य हरिभद्रसूरि ने अपने योगग्रंथों में उन सब साधनों को योग कहा है, जिनसे आत्मा विशुद्ध होती है, कर्ममल का नाश होता है और उसका मोक्ष के साथ संयोग होता है। गुरुदेव तुलसी ने अपने योगविषयक ग्रंथ 'मनोनुशासनम्' में योग को परिभाषित करते हुए कहा है— मनोवाक्कायानापानेन्द्रियाहाराणां निरोधो योगः
अर्थात् मन, वचन, काय, श्वास, इन्द्रिय एवं आहार का निरोध योग है। युग युगान्तर से भारतीय साधना योग से अनुप्राणित रही है। योगसाधना के दो रूप हैं— बाह्य रूप एवं आभ्यन्तर रूप।
योग साधना का बाह्य रूप एकाग्रता है और यही एकाग्रता योग का शरीर है। साधक एकाग्रता संपन्न है, पर यदि 'मैं' और 'मेरेपन' का भाव नहीं छूटा है, उस साधक की साधना व्यावहारिक साधना है। 'मैं' और 'मेरापन' के भावों को तिलांजलि दिए बिना साधक के योग स्थिर नहीं बन पाते। समत्व भाव का विकास नहीं हो पाता एवं उसके बिना योगसाधना भी असंभव सी लगती है। बिना योगसाधना साध्य सिद्धि में परिणत नहीं हो सकता।
मैं और मेरा (अहंभाव, ममभाव) आदि मनोविकारों का अभाव योगसाधना का आभ्यन्तर रूप है। ममत्व का परित्याग ही योग की आत्मा है। जिस साधक में मनोविकारों का अभाव है या बहुत कम है, वही साधक सच्चा योगी है, वही साधक पारमार्थिक योगी है, वही साधक साध्य को सिद्धि तक पहुंचा सकता है। गीताकार ने साधक की ऐसी साधना को समत्व योग की संज्ञा से अभिहित किया है। ऐसे योग को धारण करने वाले व्यक्ति की जिंदगी भी सफल, सफलतर और सफलतम बन जाती है।
युगप्रधान जीवंतयोगी महाश्रमणजी के जीवन पर दृष्टिपात करें, तो ऐसा लगता है कि उस महायोगी की योग साधना में योग के बाह्य एवं आभ्यन्तर दोनों रूपों का अद्‌भुत समन्वय दिखता है। उनके मन-वचन-काय की एकरूपता उन्हें समत्व योगी के रूप में प्रतिष्ठित करती है। 'मैं' और 'मेरेपन' के भावों से मुक्ति उन्हें एक पारमार्थिक योगी के रूप में प्रतिष्ठित करती है। विश्व विभूति महाश्रमणजी सहजसिद्ध एकाग्रता के धनी हैं। उनके मन-वचन-काया में महान सुयोग है, इसलिए ही वे नए-नए कीर्तिमान गढ़ते जा रहे हैं। बाह्य विक्षेप भी उनकी साधना में बाधक नहीं बन पाते हैं। अलबेले योगी की सघन एकाग्रता एवं दृष्टि की पवित्रता से मनोविकार भी उन पर आक्रमण नहीं कर पाते हैं।
'सव्वं मे अकरणिज्जं पावं' इस आगम वाक्य की आराधना द्वारा योग के स्वरूप की जीवन में जीवंत सिद्धि कर वे जीवन का मधुर संगीत भव्य प्राणियों को सुना रहे हैं।
अंतःकरण में प्रश्न उठ रहा है कि इस योग का अधिकारी कौन हो सकता है? जैन योग साहित्य में अभिनव युग के जन्मदाता जैन योग के पुनरुद्धारक आचार्य हरिभद्र ने 'योगविंशिका' ग्रंथ में चारित्रशील एवं आचारनिष्ठ साधक को योग का अधिकारी माना है। 'योगबिन्दु' में मिथ्यात्व का भेदन करने वाले एवं शुक्लपक्षी को योग-साधना का अधिकारी कहा है तथा योगाधिकारी जीवों के चार स्तर भी निर्धारित किये हैं:
1. अपुनर्बन्धक 2. सम्यग्‌दृष्टि
3. देशविरति 4. सर्वविरति
तेरापंथ के ग्यारहवें अधिशास्ता अनुत्तर दर्शनाचार के धारक अनुत्तर योगी श्री महाश्रमणजी चारित्राचार और आचारनिष्ठा में अग्रणी साधक हैं। वे महावीर परंपरा के सर्वविरति साधक हैं एवं दुनिया को भी पापविरति का संदेश देते हैं। जीवन का उच्च पुरस्कार और उसका महान भाग्य यही है कि मनुष्य किसी कार्य विशेष के लिए जन्म ले; ऐसा लगता है जन्मसिद्ध योगी महाश्रमण ने इमर्सन के इस कथन को सार्थकता प्रदान की है एवं दुनिया को बुराइयों से बचाने के लिए ही जन्म धारण किया है। अपनी योगसाधना से वे योगयुक्त जीवन की महत्ता प्रतिपादित कर रहे हैं। चारित्र के अंतर्गत योगाचार्य हरिभद्र द्वारा निर्दिष्ट पांच योग-भूमिकाएं— अध्यात्म, भावना, ध्यान, समता और वृत्ति संयम— फक्कड़ योगी महाश्रमण के जीवन में प्रतिक्षण गूंजते हुए दिखाई देते हैं। उनकी हर क्रिया ध्यान-योगमय है, इसलिए ही उनके व्यक्तित्व में हर स्थिति में उत्कृष्ट समत्वयोग की स्थिति है। योग के विविध प्रयोगों से साधना की भट्टी में वे काया को तपा रहे हैं। दुनिया उनको महायोग साधक के रूप में देख रही है।
योग विरहित जिंदगी बेकार क्यों है? इस प्रश्न का समाधान भगवद् गीता में मिलता है। वहां बताया गया है:
युक्ताहारविहारस्य, युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य, योगो भवति दुःखहा॥
जिसका आहार-विहार युक्त (संयत) है, कर्म में जिसकी चेष्टाएं युक्त हैं, जिसका सोना और जागना युक्त है— इस योग से उसके सारे दुःख मिट जाते हैं। इससे बड़ी उपलब्धि और क्या हो सकती है। योग रहित जीवन दुःखमय बन जाता है। योगयुक्त आत्मा अलौकिक योगी के रूप में सामने आती है। योगविभूति महाश्रमणजी योगयुक्त विशुद्धात्मा के रूप में हमारे आदर्श हैं। कल्याण का इच्छुक हर प्राणी स्वयं को योगसाधना में योजित कर योगयुक्त विशुद्धात्मा बनने की ओर अपने कदमों को गतिशील करे ताकि सब दुःखों से मुक्ति की ओर अग्रसर हो सके। अपने योगों की शक्ति-संपन्नता से जीवन की साधकता सिद्ध कर सके।
शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक स्वास्थ्य का अचूक उपाय भी योगासन है। यहाँ योग शब्द आसन, प्राणायाम आदि अर्थों में प्रयुक्त है। यह योग शरीर को साधना के अनुकूल बनाने में सहायक बनता है।
अनन्त शक्तियों की प्रकाशपुंज आत्मा के मन, वचन, काय के योग जब अपनी चंचल वृत्तियों-प्रवृत्तियों पर नियंत्रण कर लेते हैं, विषयग्रह की शून्यता को प्राप्त हो जाते हैं, विशद और निर्मल बन जाते हैं, तब ऐसी आत्मा योगयुक्त आत्मा कहलाती है। वही जीवन की सार्थकता को सिद्ध करने वाली आत्मा होती है। योगयुक्त महात्मा महाश्रमण को जन्मोत्सव और पट्टोत्सव पर श्रद्धायुक्त नमन। योगयुक्त आत्मा का पवित्र योग ही जीवन में सफलता का महामंत्र है। यह पवित्र योग ही आत्मविकास में अहम भूमिका निभाता है। यह पवित्र योग ही साध्यसिद्धि का सोपान है। योगयुक्त साधक की यह योगसाधना ही लौकिक व लोकोत्तर सभी लब्धियों की प्राप्ति का कारण है।
आओ करें योग के द्वारा आत्म कल्याण!!!