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तीर्थंकर के प्रतिनिधि महाश्रमण–सु–प्रज्ञप्त
दसवे आलिय आगम के चतुर्थ अध्ययन में एक शब्द आता है— 'सुपण्णत्ता'। सुपण्णत्ता - सु-प्रज्ञप्त - इसका अर्थ है — 'जिस प्रकार प्ररुपित किया गया है उसी प्रकार आचीर्ण किया गया है'। अर्थात् भगवान महावीर ने जो कहा वही आचरण किया या यों कहें जो आचरण किया वही उपदेश दिया। तीर्थंकर प्रतिनिधि आचार्य महाश्रमण जी भी जो कहते हैं उसका आचरण करते हैं या यों कहें जो आचरण करते हैं वही उपदेश देते हैं। आचार्य महाश्रमण जी के सानिध्य में जो आता है अथवा उनके निकट या दूर रहता है, वह इसका साक्षात् अनुभव कर सकता है कि आचार्य महाश्रमण जी के जीवन में कथनी-करणी की समानता है। इस सु-प्रज्ञप्त शब्द के आलोक में यदि हम पूज्यवर के जीवन का पर्यवेक्षण करते हैं तो ज्ञात होता है कि उनका जीवन दर्शन सूक्त से अभिमण्डित है। आचार्य महाश्रमण जी अपने प्रवचन में ये सूत्र फरमाते हैं:
–मेरा संयम मुझे प्यारा है।
–मेरा संघ मुझे प्यारा है।
–मेरा सुगुरु मुझे प्यारा है।
1. मेरा संयम मुझे प्यारा है
मुनि सुमेरमल जी (लाडनूं) का सरदारशहर वि.स. 2030-31 का चातुर्मासिक प्रवास, बालक मोहन के लिए संयम की राह को प्रशस्त करने वाला सिद्ध हुआ। 11 वर्षीय बालक मोहन के सामने जब मुनि श्री सुमेरमल जी ने एक निर्णय करने का निर्देश दिया— 'आज तुम्हें एक निर्णय करना चाहिए कि तुम्हें साधु बनना है या गृहस्थ जीवन में ही रहना है'। तब बालक मोहन ने एकान्त में बैठकर अपने भविष्य का चिन्तन प्रारम्भ किया। आचार्य कालूगणी का जप करके आत्मा के हित-अहित का अनुचिन्तन किया। बालक मोहन ने सोचा— साधु जीवन कठिन है तो गृहस्थ जीवन में भी अनेक कठिनाइयाँ हैं। कहीं भी रहो कठिनाई तो झेलनी ही है, किन्तु जहाँ साधु जीवन मोक्ष ले जाने वाली सरणि है, वहीं गृहस्थ जीवन अधोगति का कारण है। साधु जीवन से 15 भवों में ही मुक्ति संभव है। भीतर का दीपक जल उठा और बालक मोहन संयम स्वीकारने हेतु, साधु बनने हेतु कृत-संकल्प हो गया।
2. मेरा संघ मुझे प्यारा है
मुनि मुदित के बाल जीवन की यह घटना हर साधु के लिए आदर्श रूप है। यह एक प्रसिद्ध घटना है— सन् 1979 मुनि मुदित के दिल्ली प्रवास की, जब मुनि मुदित मुनि रूपचन्द जी के साथ में थे। रूपचन्द जी ने कहा— 'मुदित! मैं संघ से अलग होने जा रहा हूँ, तुम अपना चिन्तन कर लो तुम्हें कहाँ रहना है? हमारे साथ चलना है या यहीं संघ में रहना है'।
सतरह वर्षीय बाल मुनि मुदित ने तत्काल कहा— 'मैं तो संघ में ही रहूँगा'। यह निर्णय करने के बाद मुनि मुदित युवाचार्य महाप्रज्ञ जी के पास अणुव्रत भवन में चले गए। यह खबर सुन युवाचार्य महाप्रज्ञ जी ने फरमाया— 'यह तो मुझे विश्वास ही था'। पंजाब यात्रा में यात्रायित आचार्य तुलसी ने संदेश के माध्यम से मुनि मुदित की प्रशंसा करते हुए फरमाया— 'मुनि मुदित ने इतनी छोटी अवस्था में भी जिस शालीनता और संघनिष्ठा का परिचय दिया है, वह सब बाल साधुओं के लिए अनुकरणीय है'। यह थी मुनि मुदित की संघ के प्रति गहरी निष्ठा, जिसने उनके जीवन की आरोहण यात्रा का प्रारंभ कर दिया।
3. मेरा सुगुरु मुझे प्यारा है
आचार्य महाश्रमण जी के जीवन में गुरु के प्रति विनय और समर्पण बेजोड़ है। जिसकी संयम के प्रति गहरी निष्ठा होती है और जो संघ निष्ठा से परिपूरित होता है, वही व्यक्ति गुरु के करीब होता है। वास्तव में गुरु ही हैं जो हमें संघनिष्ठा और संयमनिष्ठा की प्रेरणा देते हैं।
आचार्य महाश्रमण जी के जीवन का हर पन्ना गुरु भक्ति के भाव उजागर करता है। युवाचार्य मनोनयन पर आपने कहा— 'गुरु का वात्सल्यभाव मुझे मिलता रहे। मैं गुरुभक्ति और गुरु आज्ञा को बहुत महत्त्व देता हूँ और भविष्य में भी देता रहूँगा। मेरे मन में अपने गुरु आचार्य श्री महाप्रज्ञ के प्रति परमभक्ति का भाव है। उनकी दृष्टि की अनुपालना के लिए मुझे बड़े से बड़ा कष्ट भी झेलना पड़े तो वह भी सहर्ष स्वीकार है'।
आचार्य पदाभिषेक पर भी आपने कहा— 'आचार्य तुलसी व आचार्य महाप्रज्ञ का वरद सानिध्य, महत्त्वपूर्ण पथदर्शन मुझे प्राप्त हुआ। दोनों धर्मगुरुओं के प्रति मैं श्रद्धाप्रणत हूँ'। आपने गुरुभक्ति का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा— 'परम श्रद्धेय आचार्य तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञ जी द्वारा प्रारंभ और पोषित गतिविधियों को यथौचित्य संचालित करने का प्रयत्न करता रहूँगा'। आपने पूज्य गुरुदेव आचार्य महाप्रज्ञ जी के अधूरे संकल्पों को पूर्ण करने का निर्णय लिया और वर्ष 2011 का केलवा में व 2012 का जसोल में चातुर्मास तथा मर्यादा महोत्सव कर गुरु वचनों को अमोघ किया। जब भी कोई विशेष कार्य प्रारंभ करना हो, तो आचार्य तुलसी के गीत की ये पंक्तियाँ आपके सम्बोधन में समाहित होती हैं:
'बात-बात प्रवचन-प्रवचन में, गण-गणपति रो नाम। सरल कसौटी सुविनीता री, दो चावल कर थाम ॥'
आचार्य महाश्रमण जी के जीवन में परिलक्षित ये सूत्र हमारे जीवन को भी सुंदर व प्रशस्त बनाएँ, यही मंगल कामना है।