प्राणवान संकल्प पुरोधा पुरुष: आचार्य महाश्रमण

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साध्वी शुभ्रयशा

प्राणवान संकल्प पुरोधा पुरुष: आचार्य महाश्रमण

प्राणवान संकल्प वह सूर्य है जो जीवन को प्रकाश से भर देता है। जिस व्यक्ति के भीतर संकल्प रूपी सूर्य उदित हो जाता है, उसके लिए असंभव जैसा कुछ भी नहीं रहता। सिद्ध संकल्प एक जादुई पिटारा है, एक चामत्कारिक मंत्र है, जो असंभव को संभव, कठिन को सरल और दुर्लभ को सुलभ बना देता है।
सन् 1930 में महात्मा गांधी ने यह संकल्प लिया कि जब तक स्वराज नहीं मिलेगा, तब तक आश्रम में वापस नहीं लौटूँगा। उस दृढ़ संकल्प शक्ति के द्वारा उन्होंने अपना लक्ष्य प्राप्त किया। आप सब जानते हैं कि जिस बच्चे को अध्यापक ने बेवकूफ कहकर पाठशाला से निकाल दिया था, उस बच्चे को माँ के संकल्प ने विश्व का महान वैज्ञानिक एडिसन बना दिया। ऐसे एक नहीं अनेक घटना प्रसंग हैं जिनसे यह स्पष्ट होता है कि दृढ़ संकल्प जीवन का कल्पवृक्ष है। व्यक्ति उससे जो माँगे, वह मिल सकता है; किंतु ऐसा तभी संभव है, जब व्यक्ति का संकल्प सिद्ध होता है।
संकल्प सिद्धि की प्रक्रिया :
संकल्पी पुरुष केवल बड़ा काम ही नहीं करते, किन्तु वे छोटे-छोटे कामों को भी महान तरीके से करते हैं। ऐसे ही एक महान पुरुष हैं, तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण। आप संकल्प पुरोधा पुरुष हैं और आपका संकल्प प्राणवान है। ऐसा लगता है आचार्य श्री महाश्रमण जी ने अपने जीवन में 'भगवती सूत्र' में समागत संकल्प सिद्धि की प्रक्रिया को आत्मसात कर लिया है।
भगवती सूत्र में उल्लेख है :
आढाह परियाणह सुमरह, अट्ठम बंधह, निदानं पकरेह, ठितिपकप्पं पकरेहा
1. आदर: संकल्प का पहला सूत्र है 'आदर'। जिसके प्रति आदर का भाव नहीं होता, उस विषय का संकल्प सिद्ध नहीं होता।
2. परिज्ञा : इसका दूसरा तत्त्व है 'परिणा' (संकल्प-विषय की धारणा)। धारणा होने पर ही संकल्प की सिद्धि होती है।
3. स्मृति : तीसरा सूत्र है 'स्मृति'। संकल्पित विषय की सतत स्मृति संकल्प-सिद्धि के लिए आवश्यक है।
4. अर्थबन्ध : चौथा सूत्र है 'अर्थबन्ध'। संकल्प के प्रयोजन के साथ तादात्म्य स्थापित करने पर वह सिद्ध होता है।
5. निदान : पाँचवाँ सूत्र है 'निदान'। वृत्तिकार अभयदेव सूरि के अनुसार यहाँ निदान से तात्पर्य है—प्रार्थना विशेष। संकल्प-विषय के प्रति तीव्र अभिलाषा संकल्प-सिद्धि के लिए आवश्यक होती है। आचार्य प्रवर ने आगमानुसारी संकल्प सिद्धि की इस प्रक्रिया में अपने आपको समर्पित कर दिया है।
अडोल संकल्प के उदाहरण :
2015 में नेपाल (काठमांडू) का भूकंप दिल को दहलाने वाला दृश्य था। भूकंप के बाद भी कई दिनों तक आने वाले झटके कभी-कभी मस्तिष्क को भी झंकृत कर देते और नींद से जगा देते। ऐसी स्थिति में पूज्यवर का संकल्प मेरु की भाँति अडोल व अकम्प रहता। काठमांडू प्रवास के बाद विहार का प्रसंग आया। अनेक शुभचिन्तकों, प्रशासन के पदाधिकारियों, वरिष्ठ साधु-साध्वियों और श्रावक-श्राविकाओं ने भावनाएँ निवेदित कीं कि ऐसी स्थिति में आपको पाद-विहार नहीं करना चाहिए और वायुयान आदि वैकल्पिक व्यवस्था का उपयोग करना चाहिए। किसी ने तो यहाँ तक कहा कि हम आपके लिए 'चार्टर्ड फ्लाइट' या हेलीकॉप्टर की व्यवस्था करते हैं।
श्रावकों ने निवेदन किया कि आपका शरीर केवल आपका ही नहीं, पूरे धर्मसंघ का है और इसकी सुरक्षा हमारा दायित्व है। पूज्यवर ने सबके सुझावों को बड़े ध्यान से सुना और सबका आदर किया, किंतु प्राकृतिक आपदा की उस विकट परिस्थिति में भी आपने पाद-विहार का ही निर्णय किया। यह आपके प्राणवान संकल्प की जीत थी।
प्राणवान संकल्प का एक और जीवंत उदाहरण है—आचार्य तुलसी शताब्दी पर 'सौ मुनि दीक्षा' का संकल्प :
आपका यह संकल्प सवा सौ प्रतिशत सफल हुआ। संकल्प की सम्पूर्ति के लिए आपने बार-बार साधु-साध्वियों को प्रेरित किया और संकल्प की बार-बार स्मृति कर उसे सिद्धि तक पहुँचाया।
संकल्प से सिद्धि :
जैसे बूँद-बूँद से घट भरता है, वैसे ही छोटे-छोटे संकल्प भी बड़े इरादों को पूरा कर देते हैं। संकल्प तभी महत्वपूर्ण है जब संकल्पकर्ता एकलव्य की तरह लक्ष्यभेदी बाण साधने के लिए कटिबद्ध हो। इसी संकल्प शक्ति के आधार पर आपने कोरोना काल में भी लक्षित मंजिल प्राप्त की। सोलापुर से हैदराबाद व हैदराबाद से भीलवाड़ा तक की यात्रा स्वयं इसकी साक्षी है। इंदौर के श्रावक समाज ने यात्रापथ छोटा करने का अनुरोध किया, किंतु धुन के पक्के आचार्य श्री के चरण लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में अनवरत गतिशील रहे।
वर्तमान परिस्थिति में 'अहिंसा यात्रा' ने यह सिद्ध कर दिया कि संकल्प शक्ति के द्वारा असंभव को संभव किया जा सकता है। संकल्प से व्यक्ति का आत्मविश्वास बढ़ता है और आत्मशक्ति का जागरण होता है। विश्व में जिसने भी उन्नति की है, उसके पैरों की गति के साथ मस्तिष्क में संकल्प की सृजनशील तरंगें भी गतिशील रही हैं। राम हों या रहीम, गांधी हों या विनोबा, आचार्य श्री भिक्षु हों या आचार्य जयाचार्य अथवा आचार्य तुलसी हों या आचार्य महाप्रज्ञ—सभी की आत्मकथाएँ संकल्प शक्ति के जागरण का शंखनाद करती हैं।
किसी ने कहा है— जो संकल्प शक्ति का प्रज्ज्वलित दीपक अपनी हथेली पर रखकर चलता है, अंधियारी राहें स्वयं आलोकित होकर उसका पथदर्शन करती हैं।
आचार्य श्री महाश्रमण एक प्राणवान संकल्प पुरोधा पुरुष हैं। आपके जीवन की हर गतिविधि में संकल्प की सुवास आती है। ऐसे प्राणवान संकल्प पुरोधा पुरुष को शत्-शत् प्रणाम!