रचनाएं
संघ के पारस– आचार्य श्री महाश्रमण
गण उपवन की हर कली में, आज नव उल्लास छाया
महामहिम अभिषेक दिन पर, आस्था का उपहार सजाया
भक्ति का सागर भरा है, शक्ति का अहसास दे दो
चीर कर तम को सदा बढ़ती रहूँ, ज्योति का विश्वास दे दो
क्यों निहारूँ गगन के झिलमिल सितारे
जब धरा के सूर्य का है प्राप्त मुझको सुखद साया
उपवन गण की हर कली में, आज नव उल्लास छाया
कदम ये अविरल बढ़ें अब लक्ष्य पाने, प्रगति की अब राह दे दो
विलय हो आलस्य का पुरुषार्थ जागे, वह अमिट उत्साह दे दो
क्यों करूँ इंतज़ार क्यों दस्तक लगाऊं, स्वयं को पहचानने का गुर सिखाया
गण उपवन की हर कली में, आज नव उल्लास छाया
संघ के पारस तुम्हारा स्पर्श पाकर, लोहमयी अज्ञान की जड़ता मिटेगी
उदय होगा नव्य प्रज्ञा किरण का अब,चेतना से धूल की परतें हटेगी
क्यों सजाऊं थाल जब तुम स्वयं ही हो उत्कृष्ट मंगल
चरण इंगित पर बढ़ें संकल्प से मन को सजाया
उपवन की हर कली में, आज नव उल्लास छाया
महामहिम अभिषेक दिन पर, आस्था का उपहार सजाया