निर्मल गंगा नीर, वंदना महाश्रमण

रचनाएं

'शासन गौरव' साध्वी कनकश्री

निर्मल गंगा नीर, वंदना महाश्रमण

निर्मल गंगा नीर, वंदना महाश्रमण,
शीतल मलय समीर, वंदना ज्योतिचरण।
नेमां दुलारे हैं, अखियों के तारे हैं,
धरती के सूरज सारे विश्व के उजारे हैं,
इस युग के महावीर, वंदना महाश्रमण॥
समता की मूरत ये मुनीश शांतिदूत हैं,
श्रम के पुजारी फैला सुयश अद्भूत है।
दूगड़ कुल अवतंस की महिमा अकूत है,
गांव-गांव घूमता ये योगी अवधूत है।
नयन निहारे हैं, अनुपम नजारे हैं, धरती के सूरज...
सागर वर गंभीर, वंदना ज्योतिचरण॥
महावीर प्रभु का निनाद, सांस-सांस में,
अभय, अहिंसा, संयम मुखर विश्वास में।
समय प्रबंधन सुंदर यात्रा-प्रवास में,
चिंतन-मंथन चलता निशि दिन संघ के विकास में।
शास्ता हमारे हैं, दुनिया में न्यारे हैं, धरती के सूरज...
तेरापंथ तकदीर, वंदना महाश्रमण॥
भैक्षव शासन के ये उजले प्रभात हैं,
वीतरागी साधना है, कुंदन से अवदात हैं।
देश व्यापी यात्राएं कर जगत विख्यात हैं,
करुणा के निधान आर्य प्रज्ञा पारिजात हैं।
लाखों को तारे हैं, पार उतारे हैं, धरती के सूरज...
बदली युग तस्वीर, वंदना ज्योतिचरण॥
(धुन – करुणा के भंडार हमारे महावीरा)