व्यक्तित्व की रेखाओं में आचार्य महाश्रमण

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मुनि भव्य कुमार

व्यक्तित्व की रेखाओं में आचार्य महाश्रमण

शब्द परिमित हैं व्यक्तित्व की रेखाएं अपरिमित। परिमित से अपरिमित को बांधने का प्रयास गागर में सागर भरने जैसा है। परन्तु जब यथार्थता अभिव्यक्ति पाने के लिए ललचाती है तब व्यक्ति ऐसा असंभाव्य प्रयास भी कर बैठता है। आचार्य महाश्रमण का व्यक्तित्व कुछेक रेखाओं से निर्मित है पर वे रेखाएं अत्यन्त स्फुट हैं। समस्त रेखाएं यथार्थता की परिक्रमा किये चलती हैं। अतः उन्हें श्लाघा के रंग से रंगने की आवश्यकता नहीं रहती। वास्तव में वे जो हैं वे ही हैं। इससे अतिरिक्त और कुछ नहीं। उनके व्यक्तित्व का लेखा-जोखा अनुभूति में है शब्दों में नहीं। अनुभूति चेतन है और शब्द जड़। फिर भी दृश्य लोक शब्दों के सहारे ही समझता-बूझता है। अतः हम चेतन को जड़ माध्यम से अभिव्यक्त करने का दुःसाहस करते हैं। आचार्य महाश्रमण का व्यक्तित्व चित्रण भी कुछ ऐसा ही लघु प्रयास है।
आचार्य महाश्रमण का बाह्य और आन्तरिक दोनों ही प्रकार का व्यक्तित्व बड़ा आकर्षक है। गौर वर्ण, मझला कद, प्रशस्त व भव्य ललाट, तीखी और उठी हुई नासिका, गहराई तक झांकते तेजोदीप्त नयन, अद्भुत कान, गीर्वाण ग्रीवा, भरा हुआ मनमोहक मुखमण्डल और भव्य संस्थान – यह है आपका प्रथम दर्शन से ही आकृष्ट करने वाला दृश्य व्यक्तित्व।
आचार्य महाश्रमण का आन्तरिक व्यक्तित्व इससे भी कहीं बढ़कर है। आप एक धर्म सम्प्रदाय के आचार्य होते हुए भी सभी सम्प्रदायों की विशेषताओं का आदर करते हैं और सहिष्णुता के आधार पर उन सबमें नैकट्य स्थापित करते हैं। आप मानव में नैतिकता, सद्भावना और नशामुक्ति के संस्कारों को जगाकर भूमण्डल पर मानवता की प्रतिष्ठा में अहर्निश लगे हैं। अथक परिश्रम आपके मानस को अपार तुष्टि प्रदान करता है।
आत्मवान् व्यक्तित्व -
जीवन के दो पक्ष हैं - एक मुख्य और दूसरा गौण। मुख्य वह है जो किसी भी स्थिति में छोड़ा न जा सके। कितनी ही व्यस्तता हो वह तो होगा ही। गौण कार्य वह है जिसे किया हो या न किया हो फिर भी चल सकता है। हुआ तो अच्छा, न हुआ तो भी अच्छा। कोई चिन्ता का विषय नहीं होता। जीवन में व्यवहार का मुख्य स्थान है या अध्यात्म का, यह एक सोचनीय प्रश्न है। यदि अध्यात्म मुख्य तो व्यवहार गौण हो जाता है और यदि व्यवहार मुख्य तो अध्यात्म गौण। वास्तव में जो मुख्य होता है वही ओजस्वी, तेजस्वी, वर्चस्वी बनाता है। आचार्य महाश्रमण इसके साक्षात् उदाहरण हैं।
आचार्य महाश्रमण एक अध्यात्म पुरुष हैं और आपका मुख्य कार्य है अपनी आत्मा में स्थित रहना। आपका हर कार्य, हर लक्ष्य का केन्द्र आत्मा रहता है। वास्तव में आप एक आत्मवान् व्यक्तित्व के धनी हैं। जो आत्मवान् होता है वही विद्वान् होता है। आप आत्मवान् भी हैं और विद्वान् भी। विद्वान् को गंभीर होना चाहिए। आप सागर से भी ज्यादा गंभीर हैं। इतने ज्यादा गंभीर कि अनुत्तरदायित्वपूर्ण कोई भी बात आपके मुख से निकलती ही नहीं। न जाने कितनी-कितनी अनुकूल या प्रतिकूल बातों को आप पचा जाते हैं, भुला देते हैं।
अप्रमादी व्यक्तित्व -
आचार्य महाश्रमण का जीवन अप्रमाद-चेतना की जीवन्त मिसाल है। आपका पूरा जीवन अप्रमत्तता की अवस्था में रहा है। हर छोटी से छोटी बात, हर छोटे से छोटा कार्य में आप हमेशा पूर्ण सजग और सावधान रहते हैं। भगवान महावीर के जागरूकता के सूत्र को आपने आत्मसात् कर लिया है। इसीलिए आपका आहार संयम, वाणी संयम, निद्रा संयम और उपकरण संयम इतना प्रशस्त है कि देवता भी प्रसन्न हो जाएं। आपका जीवन भाव साधुता को पूर्ण चरितार्थ करने वाला है। कहा गया है -
क्षान्त्यादि गुण सम्पन्नो, मैत्र्यादि गुण भूषितः।
अप्रमादी सदाचारी, भाव साधुः प्रकीर्तितः।।