आध्यात्मिक पथदर्शक: आचार्य महाश्रमण

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साध्वी माधुर्यप्रभा

आध्यात्मिक पथदर्शक: आचार्य महाश्रमण

दुनिया में अनेकों विद्याएँ हैं, जैसे ज्योतिष विद्या, रसायन विद्या, अंक विद्या, स्वास्थ्य चिकित्सा विद्या, गणितीय विद्या, खगोल विद्या आदि। ये सब विद्याएँ इहलोक तक ही सीमित हैं, मृत्यु के बाद हमारे साथ नहीं जाती हैं। आत्मविद्या वह विद्या है जो भवान्तर में हमारे साथ जाती है। यह यथार्थ का बोध करवाकर, स्वार्थ का त्याग करवाकर, परमार्थ तक पहुँचाने में समर्थ है। इसीलिए कहा गया है— 'सा विद्या या विमुक्तये'— विद्या तो वही है जो दुःखों से मुक्त कराये, शाश्वत सुख की ओर प्रस्थान करवाये।
आत्मविद्या ही सुख-शांति और समाधि की चाबी है, जो असंयम पर संयम का अंकुश लगा सकती है। जब तक कर्मों को रोकने का, निवारण करने का या क्रमशः क्षय करने का प्रयास नहीं होता, तब तक असली सुख और शांति की प्राप्ति नहीं हो सकती।
आत्मविद्या के पथ पर अग्रसर होने के लिए पथदर्शक की जरूरत है। पथदर्शक के नाम पर आज दुनिया में भीड़ लगी हुई है, पर वे (सच्चे) पथदर्शक नहीं बन सकते। अध्यात्म का पथदर्शन वे ही कर सकते हैं, जिनका जीवन ही दर्शन हो, आचरण ही आदर्श हो, साधना ही शक्ति हो। जीवन्त दर्शन, उन्नत आचरण और उत्कृष्ट साधना के साधक पुरुष हैं आचार्य महाश्रमण।
आचार्य महाश्रमण आध्यात्मिक पथदर्शक के रूप में सम्पूर्ण मानवजाति एवं विशेष रूप से अपने अनुयायियों व शिष्य संपदा का आध्यात्मिक पथदर्शन करवा रहे हैं। आचार्य महाश्रमण विलक्षण योगी और साधक हैं। वे स्वयं बहुत कम बोलते हैं लेकिन उनके आदर्श बोलते हैं। 'My Life is my message' (मेरा जीवन ही मेरा संदेश है), यह सुविचार आचार्य महाश्रमण के जीवन में अक्षरशः घटित होता है।
बंगाल (कलकत्ता) के सांसद सुदीप जी बंदोपाध्याय ने अमृत महोत्सव के चौथे चरण के समय आचार्य श्री महाश्रमण जी के लिए कहा था— 'आपने अमृत महोत्सव के दौरान जितना काम किया है, उतना तो एक सरकार भी किसी योजना के दौरान नहीं कर सकती'।
स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन जी भागवत ने कहा था— 'भारत का काम दुनिया को मर्यादा सिखाने का रहा है। पुस्तकों में ज्ञान-भाषण ही रहता है, पर उसे सिखाने के लिए आचरण चाहिए। वह तो आप ही सिखा सकते हैं'। पूज्य गुरुदेव में साधना के परमाणु वैसे ही खचाखच भरे हैं, जिस तरह लोक असंख्य परमाणुओं से भरा है। 
आचार्य महाश्रमण के रोम-रोम में, श्वास-श्वास में पवित्रता के परमाणु व्याप्त हैं, जो आगंतुकों को पवित्र बना देते हैं। आचार्य महाश्रमण की हर साधना, हर आराधना के केंद्र में आत्मा की झंकार है। उत्तराध्ययन आगम में कहा गया है:
नाणस्स सव्वस्स पगासणाए, अन्नाणमोहस्स विवज्जणाए।
रागस्स दोसस्स य संसएणं, एगन्तसोक्खं समुवेई मोक्ख॥
अर्थात् सम्पूर्ण ज्ञान का प्रकाश, अज्ञान और मोह का नाश तथा राग-द्वेष का क्षय होने से आत्मा एकान्त सुसमय मोक्ष को प्राप्त करती है। आचार्य महाश्रमण स्वयं इस आराधना में संलग्न हैं। ऐसा लगता है मानो विकृति के बाजार में वे संस्कृति का शंखनाद कर रहे हैं, ज्ञान का प्रकाश फैलाकर अज्ञान और मोह का नाश कर रहे हैं। राग-द्वेष क्षय करने का मार्ग बताकर सम्पूर्ण शिष्य समुदाय का आध्यात्मिक पथदर्शन करवा रहे हैं।
 1. ज्ञान के प्रकाश से पथदर्शन :
आत्मा ज्ञान का दर्पण है। गीता में ज्ञान को नौका कहा गया है। आचार्य महाश्रमण की ज्ञान चेतना भी विलक्षण है। यथावसर बहुत उपयुक्त उदाहरणों द्वारा समझाने की उनकी कला विलक्षण है, जो आध्यात्मिक पथदर्शक होने का उत्कृष्ट उदाहरण है। आचार्य श्री महाश्रमणजी अपनी अमृतमयी वाणी से शिष्यों का दिशादर्शन करते हैं:
 –सम्यग् ज्ञान वृद्धिंगत हो, जिससे बहुश्रुतता बढ़े।
 –श्रुत विकास के लिए प्रज्ञा-प्रतिभा द्वारा पुरुषार्थ किया जाए।
पूज्य गुरुदेव चाहते हैं कि शिष्य संपदा आत्मसमाधि के साथ बहुश्रुतता एवं प्रबुद्धता को प्राप्त करे। इसलिए वे प्रेरणा देते हैं कि योगक्षेम वर्ष पी.एच.डी. करने का स्वर्णिम अवसर है। मुताराधना, तत्वज्ञान, तेरापंथ दर्शन आदि पाठ्यक्रमों से जुड़ने से ज्ञानवता का विकास हो सकता है।
आचार्य श्री महाश्रमणजी की प्रवचन शैली में जो सहज, सरस ज्ञानात्मकता है, वह सबको कृत-कृत्य कर देती है। नवागंतुकों को वह अनायास ही आकृष्ट कर लेती है। केवल जैन ही नहीं, कितने ही अजैन लोग कहते हैं— 'हम टी.वी. चैनल पर आचार्य श्री महाश्रमणजी का प्रवचन सुनते हैं और हमें हमारी समस्या का समाधान मिल जाता है'। उनके प्रवचन सर्वहिताय हैं। भगवद्गीता और धम्मपद प्रवचनमाला ने समन्वयवादिता को मुखर कर अलौकिक पथदर्शन दिया है।
2. अज्ञान और मोह का नाश करने का पथदर्शन:
अध्यात्म का प्रथम पड़ाव है सम्यग्दर्शन। सम्यग्दर्शन घट-घट में उजाला करने वाला है। निर्मल सम्यग्दर्शन के धारक आचार्य महाश्रमण युगद्रष्टा एवं युगस्रष्टा हैं। वे सिद्धांतप्रियता और वैचारिक औदार्य के दुर्लभ समवाय हैं। वे चिंतन की प्रौढ़ता और सूक्ष्मदर्शिता से अपने शिष्य समुदाय को अज्ञान के अंधकार के निवारण की प्रेरणा और वैराग्य को पुष्ट करने का आध्यात्मिक पथदर्शन करवाते हैं। 'अनुशासन पर्व' के माध्यम से नियमों एवं मर्यादाओं की पुनः-पुनः स्मारणा करवाकर अनुशासन का पाठ पढ़ाते हैं।
प्रेरणा दीप (सद्वाक्य):
 – ज्ञाने तर्कः, आज्ञायां सतर्कः।
 – सार है तो स्वीकार करो— नहीं तो परिष्कार करो।
 – सहन करना थोड़ा है तो कठिन, पर लाभकारी है।
–चिंता ही करना है तो दिन भर भार क्यों ढोना,आधा घंटा बैठकर जो चिंतन करना है कर लो, फिर निश्चिंतता से अपना कार्य करो।
–अंतिम श्वास से पहले एक बार समग्र आलोचना हो जाए।
–मन का दमन, इंद्रियों का शमन; प्रतियोगी नहीं, सहयोगी बनें— उपयोगी बनें।
– शुद्धि का उपाय प्रतिक्रमण है, खुद शुद्ध रहें।
–थोड़े से भौतिक लाभ के लिए चारित्र का खजाना लुट न जाए।
ये वाक्य साधना के बीहड़ पथ पर बढ़ते साधक के लिए 'प्रेरणा दीप' बनते हैं।
3. राग-द्वेष क्षय करने का पथदर्शन :
'रागो य दोसो बीय कम्मबीयं'— राग और द्वेष कर्म के बीज हैं। बीज तभी वृक्ष बनता है जब उसे अनुकूल वातावरण मिले, अन्यथा वह निष्प्राण हो जाता है। आचार्य महाश्रमण राग-द्वेष के बीजों को न तो कषायों की खाद देते हैं, न प्रमाद और अशुभ योग का वातावरण। उनके राग-द्वेष के बीज बहुलांश रूप में निष्प्राण सम हैं। वे वीतरागता की ओर अग्रसर हो रहे हैं।
उनकी सतत 'आत्मस्थता', कषाय विजय और अनुकूल-प्रतिकूल दोनों परिस्थितियों में समत्व की साधना स्तुत्य है। वे 'भीतर जिएँ बाहर' के साक्षात् उदाहरण हैं। यही कारण है कि उनकी सन्निधि में जो आता है, वह पवित्रता और राग-द्वेष विमुक्ति का अनुभव करता है।
पथदर्शन के मुख्य बिंदु:
–भावों की जितनी शुद्धि रह सके, रखने का प्रयास करना चाहिए।
–ध्यान प्रतिदिन करना चाहिए; यदि समय न मिले तो ध्यान हमारी हर क्रिया में उतर जाए।
–प्रतिक्रमण और प्रायश्चित वर्तमान में वे उपाय हैं जिनसे चारित्र की निर्मलता रह सकती है।
–आसक्ति से दोषों का सेवन न हो जाए।
वर्तमान योगक्षेम वर्ष में दर्शन केंद्र पर 'नमो सिद्धाणं' के ध्यान के प्रयोग द्वारा वीतरागता की दिशा में अग्रसर होने का पथदर्शन मिल रहा है।
ऐसे दुर्लभ संयोग और कुशल नेतृत्व को आध्यात्मिक पथदर्शक के रूप में पाकर हम धन्य हैं। जब तक हम भवसागर पार न पहुँचे, यह अनुपम पथदर्शन मिलता रहे।
नाव मिली, नाविक मिले, मिली सुघड़ पतवार।
अब क्या चिंता है हमें, पहुँचेंगे भवपार॥