रचनाएं
तेरापंथ के अखिलेश- आचार्य श्री महाश्रमण
मेरी सांसों में हरदम बसा गुरुवर का नाम है,
पावन पुनीत चरण ही मेरा असली मुकाम है।
युगप्रधान महाश्रमण को वंदन बारंबार है,
तेरी शरण मिल गई यही मेरा नॉबेल इनाम है।
अभिनंदन! वैशाख शुक्ला नवमी के उस मंगलमय क्षण को, जिस क्षण संपूर्ण मानव जाति का कल्याण करने वाले महामानव का इस रत्नगर्भा धरती पर अवतरण हुआ।
अभिवंदन! वैशाख शुक्ला चतुर्दशी के उस अभूतपूर्व क्षण को, जब ऋजुता, मृदुता तथा विनम्रता आदि अनेक गुणों से समृद्ध बालक मोहन ने संयम पथ को स्वीकार किया। वर्धापन! वैशाख शुक्ला दशमी की वह शुभ वेला, जिस समय एक छोटा सा बीज विशाल कल्पवृक्ष बन आज चतुर्विध-धर्मसंघ को शीतल छाँव प्रदान कर पाप-ताप-संताप को दूर कर रहा है।
जय-जय ज्योतिचरण! जय-जय महाश्रमण!!
तेरापंथ धर्मसंघ के 11वें अधिशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण जी वर्तमान के जैनाचार्यों में सर्वाधिक प्रतिष्ठित आचार्य हैं। आचार्य तुलसी एवं आचार्य महाप्रज्ञ के कुशल नेतृत्व में तराशी गई इस प्रतिमा में गुण पुष्पों की अनुपम बगिया महक रही है। अनुत्तर संयम, अनुत्तर ज्ञान व अनुत्तर साधना से अलंकृत पूज्यप्रवर का जीवन संयत संतता के शिखर पर विराजमान है।
तेरापंथ के अखिलेश! आपकी अलौकिक रश्मियों से पूरा विश्व जगमगा रहा है। आपश्री के ऐतिहासिक कीर्तिमानों की सौरभ से सारा जहाँ सुरभित हो रहा है। प्रभो! आपके तेजोमय आभामंडल से निकलने वाली हर किरण जन के लिए कल्याणकारी साबित हो रही है।
हे मानवता के महामसीहा! 'गुरु कृपा हि केवलं, शिष्य परं मंगलं' अर्थात् गुरु की कृपा से बढ़कर शिष्य के लिए कोई मंगल महल नहीं होता। गुरु कृपा निष्प्राण में प्राण भर देती है। प्रज्ञाचक्षु नयनसुख बन जाता है। पंगु पर्वत पर आरोहण कर लेता है। आपका संपूर्ण जीवन पवित्रता का अक्षय कोष है। अज्ञानरात्रि में सोये हुए मानव को ज्ञान का अलार्म बजाकर आप संपूर्ण भारत में जागरण का शंखनाद कर रहे हैं।
युग की धाराओं को मोड़ने वाले, नए इतिहास का सृजन करने वाले, जन की सांसों में बसने वाले युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के श्रीचरणों में इस योगक्षेम वर्ष के स्वर्णिम अवसर पर मेरी सविनय प्रार्थना है—
– मैं हर पल आपके श्रीमुख से निकले कथनों का, शब्दों का श्रवण करती रहूँ।
– मेरे बंद नयन, खुले नयन, अंतर्नयन सबमें गुरु के ही दर्शन हों।
– मेरी वाणी सदैव आपकी स्तुति करने में मग्न रहे।
– मेरा सिर सदैव आपके चरणों में नत-प्रणत रहे।
गुरुदेव की पावन सन्निधि हमें सदा प्राप्त होती रहे।