एक पवित्र निर्झरिणी

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साध्वी शुभप्रभा

एक पवित्र निर्झरिणी

एक बार विद्वज्जनों की संगोष्ठी में चर्चा चली — 'विकास के रथ पर सवार होकर कौन अपनी मंजिल शीघ्र प्राप्त कर लेता है?' अपनी-अपनी मनीषा एवं अवधारणा के अनुसार अनेक प्रतिवचन सामने आए, जिनका समवेत प्रारूप यह बना — जो आत्म-पर्यवेक्षक हो, जिस पर तकदीर मेहरबान हो, जिसमें ज्ञान-पिपासा हो, जिसका हौसला बुलंद हो, जिसके पुरुषार्थ की लौ अखंड जलती हो, जिसकी सोच सकारात्मक हो, जिसके भीतर उत्साह का दरिया लहराता हो, जिसका समय प्रबंधन अच्छा हो, आदि-आदि।
जैसे सप्तरंगी रंगों से निर्मित इंद्रधनुष सबके चित्ताकर्षण का हेतु बनता है, वैसे ही उपरोक्त सद्गुण-फूलों से सजा व्यक्तित्व रूपी गुलदस्ता सबके मन को महमहा देने वाला हो, सांसों को संयम से सुरभित करने वाला हो, प्राणों में पुलकन भरने वाला हो, आत्मा को आनंद-सागर में निमज्जित करने वाला हो, इसमें आश्चर्य ही क्या?
मेरे चर्म-चक्षुओं ने जो देखा, बुद्धि ने जो समझा, मन ने जो माना और सहवास से जो शब्द-चित्र बना, उसी के आधार पर कहा जा सकता है कि महातपस्वी, महायशस्वी, महातेजस्वी, महावर्चस्वी आचार्य श्री महाश्रमण ने नवम साध्वी प्रमुखा के रूप में जिसे मनोनीत किया है, वह विनय और विवेक की युति है, भाग्य और पुरुषार्थ की संसृति है, श्रद्धा और समर्पण की समन्विति है तथा प्रशिक्षण, परीक्षण और प्रयोग की परिणति है। आप कृपा और करुणा की मंगलमय कृति हैं तथा साध्वी, समणी, मुमुक्षु और महिलाओं के लिए एक विलोभनीय विभूति हैं।
पिता एवं परिजनों के प्यार-दुलार से अभिसिंचित सरोज (मुमुक्षु अवस्था का नाम), सविता के अभ्युदय से विकस्वर हो उठीं और अपनी विद्युत विमल आभा से सबको आपूरित करने का इरादा कर लिया। यद्यपि 'तिन्नाणं-तारयाणं' (स्वयं तैरना और दूसरों को तारना) के पथ पर बढ़ते कदमों को रोकने का भरसक प्रयत्न किया गया, पर जिसके जीवन-दीप में वैराग्य का तेल, भक्ति की बाती, पुरुषार्थ की चिमनी और समर्पण की ज्योति हो, वह दीया तूफानों के बीच भी जल सकता है और आंधियों से टक्कर ले सकता है। बहन सरोज के संकल्प ने इस तथ्य को सत्यापित कर दिया और फलतः उनकी गति कहीं भी अवरुद्ध नहीं हुई। भगवान महावीर की निर्वाण शताब्दी का वर्ष हमारे व्यक्तित्व विकास की आध्यात्मिक प्रयोगशाला 'पारमार्थिक शिक्षण संस्था' (लाडनूं) में प्रविष्टि का पहला ही वर्ष था। हम नई बहनों ने मिलकर योजना बनाई कि हमें इस वर्ष 25 उपवास, 25 आयम्बिल और एकासन करने चाहिए। यह प्रभु चरणों में हमारे त्याग की भेंट होगी। उस अनुष्ठान को निष्ठा तक पहुँचाने वाली बहनों में एक नाम मुमुक्षु सविता का था। तप-त्याग के प्रति आपकी रुचि आज भी उज्जीवित है; हर महीने लगभग छह उपवास करना आपकी सहज प्रवृत्ति बन गई है। संस्था प्रवेश से पूर्व हमें प्रतिक्रमण, पच्चीस बोल, भक्तामर और कर्तव्य-षत्रिंशिका के अतिरिक्त विशेष ज्ञान नहीं था। बड़ी बहनों को स्वाध्याय करते हुए देखतीं तो मन में आता कि काश! यह सब हमें भी आए। पंचसूत्रम् के कंठस्थीकरण से प्रारंभ हुई आपकी ज्ञान यात्रा ने एक वर्ष की अवधि में ही कल्याण मंदिर, शांत-सुधारस भावना, सिन्दूर-प्रकर आदि ग्रंथ सीख लिए। प्रति उपवास में स्वाध्याय, जप, ध्यान और मौन का तीन घंटे का क्रम चलता था। संयम, ज्ञान और वैराग्य चेतना के संपुष्टीकरण की दृष्टि से संस्था का वह प्रथम वर्ष बहुत कारगर बना। अध्ययन की दृष्टि से आप सीनियर बहनों के साथ हिंदी एवं अंग्रेजी कक्षाओं में सहभागी बनीं तथा जैन तत्वविद्या एवं 'कालो कौमुदी' पढ़ने के लिए अलग से व्यवस्थाएँ की गईं। त्रैमासिक परीक्षाओं के दौरान आगम ग्रंथ और विभिन्न दर्शनों को पढ़ने का अवसर मिला। उस समय सविता बहन की अध्ययनशीलता, ग्रहणशीलता और जागरूकता को देखकर लगता था कि उनके भीतर 'मुझे कुछ बनना है' का प्रबल भाव है। उनके भीतर से स्वर निकलता था— 'फौलादी हैं सीने अपने, फौलादी हैं बाहें, हम चाहें तो पैदा कर दें चट्टानों में राहें'। आपने अपनी दृढ़ संकल्प शक्ति और कड़ी मेहनत से अल्पकाल में ही एक विशिष्ट पहचान बना ली। आपने कभी अवसर की प्रतीक्षा नहीं की, बल्कि प्रगति के मौके स्वयं तलाश लिए। आपने समय की गेंद को हमेशा अपनी मुट्ठी में दबाए रखा और उसे कभी फिसलने नहीं दिया। जो काम जिस वक्त करणीय है, उसे पूरा करना ही है, चाहे शारीरिक कष्ट ही क्यों न हो। उस पल अन्य कार्य गौण और वही मुख्य होता था।
शायद आपने अपना लक्ष्य निर्धारित कर लिया था कि: 'If you cannot fly, run. If you cannot run, walk. If you cannot walk, crawl, but keep moving towards your goal'। लक्ष्य की सतत स्मृति और उसी दिशा में सत्प्रयास हो तो मंजिल मिलना मुश्किल नहीं है। आपकी गतिविधियों से परिलक्षित होता है कि कोई सूर्यमुखी होता है तो कोई चंद्रमुखी, पर आपका हर शब्द, हर चिंतन और हर कार्य गुरुमुखी होता है। 'आप्त वाक्यं प्रमाणम्' के सदृश गुरुवचन ही आपके लिए अंतिम प्रमाण हैं। गुरु के निर्देश चाहे संस्था में रहने के हों, दीक्षा के हों या सेवा के, आपने उन्हें हमेशा अहोभाव के साथ स्वीकार किया।
संस्था काल में आचार्य तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञ के चरणों में बैठकर आपने जो गहन प्रशिक्षण प्राप्त किया, वह आपके व्यक्तित्व की नींव बना। गुरुओं की सूक्ष्म दृष्टि ने आपके भीतर छिपी नेतृत्व क्षमता को पहचाना और उसे निखारा।
यही कारण है कि जब परीक्षण की बारी आई, तब आप हर कसौटी पर खरी उतरीं। शासनमाता साध्वी प्रमुखा कनकप्रभा जी के सानिध्य में रहकर आपने संघ की मर्यादाओं और व्यवस्थाओं को बहुत बारीकी से सीखा। शासनमाता जी का आप पर अटूट विश्वास था। वे अक्सर आपकी कार्य-निपुणता और सेवा-भाव की सराहना करती थीं।
प्रयोग की दिशा में भी आपके कदम हमेशा आगे रहे हैं। आपने केवल सिद्धांतों को पढ़ा ही नहीं, बल्कि उन्हें व्यावहारिक धरातल पर उतारा है। साध्वी संघ के विकास के लिए आपके द्वारा किए गए अभिनव प्रयोग और आपकी कार्यशैली सबको प्रभावित करती है। आपश्री के जीवन में अनेक ऐसे प्रसंग आए हैं, जो आपकी दिव्यता और सूक्ष्म शक्तियों के साथ जुड़ाव को प्रकट करते हैं। यहाँ दो विशेष प्रसंगों का उल्लेख करना चाहूँगी:
प्रथम प्रसंग:
एक बार आपश्री ने अपनी साधना के दौरान कुछ ऐसे अलौकिक अनुभव किए जो आपकी गहरी गुरुभक्ति का परिणाम थे। आपकी एकाग्रता और निष्ठा ने आपको उस आंतरिक शांति तक पहुँचाया जहाँ केवल आत्मा का स्वर सुनाई देता है।
द्वितीय प्रसंग (1986) :
दूसरा प्रसंग 1986 का है। यात्रा के दौरान आपका कुरुक्षेत्र जाना हुआ। श्री भंवरलाल जी सेठिया (सरदारशहर) के आवास में आपका प्रवास था। एक दिन सबने देखा कि जहाँ आप विराजित थीं, वहाँ दीवार पर पीला थापा (हस्त-चिह्न) मंडरा रहा है। हाथ लगाकर देखा तो वह गीला था और उससे केसर की तीव्र सुगंध आ रही थी। सभी ने और उनके पारिवारिक जनों ने जाँच-पड़ताल की, पर इसका कोई बाहरी स्रोत या रहस्य ज्ञात नहीं हुआ।
अनुमानतः यह कोई अज्ञात दैवीय सूचना थी। 'इदं तत्वं कोऽपि गम्यं'। सन् 1988 में पर्युषण पर्व के लिए जब हम पुनः कुरुक्षेत्र गए, तब उन्होंने हमें वह स्थान दिखाया और पूरा घटनाक्रम बताया। जहाँ आत्म-जागरण, जन-जागरण, समाज-जागरण और राष्ट्र-जागरण के चौराहे पर खड़ा व्यक्तित्व अध्यात्म का आलोक वितरित करता है, वहाँ ऐसा होना नामुमकिन नहीं है।
इस प्रतीति में आ रहा है कि अप्रमाद संयम का प्रहरी, विनय साधना की सुगंध, अनुशासन जीवन का संरक्षक और पापभीरुता साधु की आत्मा है। शासनमाता साध्वी प्रमुखा श्री जी के द्वारा प्ररूपित इस 'चतुष्टयी' की आप आराधक हैं। आपश्री के दैनंदिन व्यवहारों में यह प्रतिबिम्बित हो रहा है। आत्मौपम्य भाव की निर्झरिणी बनकर आपश्री सबको समान रूप से अभिसिंचित और शीतल कर रही हैं। साथ ही, समय प्रबंधन के साथ अपनी अभिरुचि और क्षमता के अनुसार प्रतिभा प्रवृद्धि के लिए अवसर प्रदान कर रही हैं। चयन दिवस के इस पावन अवसर पर आपके चरणों में श्रद्धासिक्त वंदना और कोटि-कोटि मंगल कामनाएँ।