रचनाएं
तेरापंथ के इस आंगन में, भक्ति का नया विहान हुआ
सरदारशहर की पावन धरा पर, एक नन्हा सूरज आया था,
बालक 'मोहन' के अंतर्मन में, वैराग्य का भाव समाया था।
अंतर्मन का वह पावन मंथन, संयम की एक पुकार बनी,
जब 'गुरु कालू' का ध्यान धरा, तब राह बड़ी ही साफ़ बनी।
'गुरु तुलसी' और 'महाप्रज्ञ' ने, जीवन का आधार दिया।
मुनि सुमेरमल जी के हाथों, जब संयम का श्रृंगार किया,
'आचार्य भिक्षु' की उस पावन, मर्यादा की अटूट यह थाती है,
ग्यारहवें अधिनायक की आभा, आज जग को राह दिखाती है।
वह दीक्षा का मंगल अवसर, युवा दिवस का मान हुआ,
तेरापंथ के इस आंगन में, भक्ति का नया विहान हुआ।
महासूर्य 'महाश्रमण' बनकर, जो आज धर्म को संवार रहे,
अहिंसा के पावन पथ से, वे मानवता को निखार रहे।