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तेजोनिधि सूरज के 65वें जन्मोत्सव पर मंगलकामना
मनुष्य की सुषुम्ना नाड़ी में सात चक्रों का निवास होता है। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्रार चक्र। अनाहत चक्र में साधक की प्रज्ञा बहुत दीर्घकाल तक स्थिर होने लग जाती है एवं योगी विशुद्ध चक्र की ओर बढ़ जाता है। संसार से मन विरक्त हो जाता है। आज्ञा चक्र पर पहुँचने के बाद आत्मदर्शन होता है और सहस्रार चक्र जागृत होने पर जीव अनासक्त बनकर शिव बन जाता है। प्रकाश का स्पर्श होने पर अंतर्मन में विलीन हो जाता है।
आचार्य श्री महाश्रमण जी की योग साधना अत्यंत प्रभावशाली है। सिद्ध, प्रसिद्ध, योगीराज आचार्य महाश्रमण को मैं शत-शत प्रणाम करती हूँ। आपका 65वाँ मंगल जन्मोत्सव पैंसठिया योग की सिद्धि का वरदानदाता बने। योगक्षेम वर्ष में आने वाला यह जन्मोत्सव विराट धर्मसंघ को चेतना के ऊर्ध्वारोहण की ओर प्रेरित कर रहा है।
महाज्ञानी महर्षि आचार्य श्री महाश्रमणजी परमार्थ मार्ग पर गतिमान बनकर जन-जन का पथ आलोकित कर रहे हैं। अलौकिक एवं आध्यात्मिक जन्मोत्सव को मनाने के लिए आज आचार्य श्री तुलसी की जन्मभूमि में संपूर्ण संघ समुत्सुक है।
65वें जन्मोत्सव में 11 का अंक भी विद्यमान है। 11वें आचार्य की अभ्यर्थना में मैं भी शपथ ग्रहण कर अपने साधना पथ को प्रशस्त कर सकूँ। आपकी प्राणशक्ति (Willpower) व्याधिमुक्तता की दिशा में रोगी को नीरोग बना रही है। शुद्ध समाधि की दिशा में पहुँच पाएँ, यही शुभ भावना प्रकट करती हूँ।
5 जुलाई को बवानी खेड़ा में प्रवचन के बाद युवाचार्य श्री महाश्रमण, आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी के पास पधारे। मुमुक्षु बहनें सब साथ थीं, तब आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी ने विनोद करते हुए फरमाया—
'महाश्रमण ठाठ-बाठ से पधारे, काम करे जका ठाठ-बाठ से आवे, श्रम करो सफल बनो—म्हें जका बैठा रेवां, काम तो महाश्रमण करे, विहार कर आया ज्यों लागे।'
प्रभो! आप स्ट्रिक्ट नहीं हैं। हर व्यक्ति को अपनी ट्रिक से ट्रेनिंग प्रदान करवाते हो। आपका नेटवर्क स्ट्रोंग है। जब आप पत्र चर्चा मुख्य मुनि प्रवर से करवाते हो, तब आपके पासवर्ड (Password) रहते हैं— लाल, पर्स, 3 months, ten days, समीक्षण आदि। नए तरीके से कार्य भी सफल हो जाता है। आपकी यह अनुभव सिद्धि भव्य आत्मा के भवभ्रमण में अल्पीकरण करे, यही आशीर्वाद जन्मोत्सव की अभिनव बेला में माँगते हैं।
अनुभवसिद्ध पुरुष हो भन्ते,
भव भ्रमण कम करते।
करुणा के हो तुम महासागर,
जन-जन की पीड़ा हरते।
आगार को देते अनगार प्रेरणा,
वाणी मुक्तिपथ दर्शाती।
हे वर्तमान के वर्धमान,
निर्मल शत-शत सविनय शीष झुकाती।