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साधना के शिखर पुरुष आचार्य श्री महाश्रमण
साधना के शीतल समीर तुम्हें प्रणाम,
संयम के परम वीर तुम्हें प्रणाम,
महाव्रत के पावन पट्टधर हो तुम,
संघ सरोवर के निर्मल नीर तुम्हें प्रणाम।
जो प्रमाद की नींद में सोता है उसके लिए हर समय कलियुग है, जो अंगड़ाई लेकzर जागने का प्रयास करता है उसके लिए द्वापर है। जो आगे बढ़ने के लिए तत्पर है उसके लिए त्रेता है और जो लक्ष्य की ओर निरंतर वर्धमान है, उसके लिए सतयुग है।
इस सुभाषित वचन के अनुसार युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी का गतिशील और प्राणवान व्यक्तित्व सतयुग का पर्याय है। उनके सान्निध्य से नई ऊर्जा और प्रेरणा का संचार होता है। 'चरैवेति' उनका जीवन मंत्र है। उनके चिंतन में रूढ़िवाद और यथास्थिति का आग्रह नहीं है। प्रज्ञा, साधना और पुरुषार्थ की तूलिका से उन्होंने जीवन की पुस्तक में हर वर्ष नये रंग भरे हैं। इसलिए वे जन-जन के श्रद्धा के केंद्र व प्रेरणास्रोत हैं। वे श्रमण परंपरा के तेजस्वी श्रमण नक्षत्र हैं। जिस प्रकार अनंत बूंदें मिलकर सागर का निर्माण करती हैं, उसी प्रकार अनंत गुण मिलकर एक महापुरुष का निर्माण करते हैं।
महापुरुषों का जीवन अनंत गुणों से परिपूर्ण होता है। जैसे समुद्र की लहरों को गिन पाना असंभव है, वैसे ही महापुरुषों के गुणों की अभिव्यक्ति करना दुष्कर है। आचार्य श्री महाश्रमण जी गुणों के आकर (खजाना) हैं। उनके समग्र व्यक्तित्व की व्याख्या कर पाना मेरी लेखनी के सामर्थ्य से बाहर है, फिर भी उनके जन्मोत्सव, पट्टोत्सव व दीक्षोत्सव दिवस के प्रसंग पर यत्किंचित लिखने का प्रयास कर रहा हूँ।
साधना के शिखर पुरुष :
आचार्य श्री महाश्रमणजी साधना के शिखर पुरुष हैं। जिस प्रकार मोदक को कहीं से भी चखने पर वह मीठा ही लगता है, उसी प्रकार आचार्य श्री के जीवन को कहीं से भी देखने पर साधना ही साधना दिखलाई पड़ती है। आचार्य श्री के जीवन का पल-पल साधना के रस से भीगा हुआ प्रतीत होता है। आचार्य श्री की साधना बहुमुखी है। उन्होंने अपने जीवन के कैनवास पर साधना के विभिन्न रंगों से सुंदर, आदर्श एवं अलौकिक चित्र उकेरे हैं। वे प्रवर आत्म-साधक व साधना-शिल्पी हैं। उनका इंद्रिय संयम अनुत्तर है। वे महाव्रतों, समितियों व गुप्तियों के पालन में जागरूक हैं।
त्रियोग साधक :
जैन ग्रंथों में मन, वचन और काया को त्रियोग माना गया है। आचार्य श्री के त्रियोग सधे हुए हैं। वे घंटों-घंटों एक आसन में विराजमान रहते हैं। उनकी काय-स्थिरता विशिष्ट है। वे जब ईर्यापथ के पथिक बनते हैं, तब स्वयं ईर्या-समिति गौरवान्वित होती प्रतीत होती है। कभी-कभी एक दिन में सैकड़ों बार हाथ उठाकर आशीर्वाद प्रदान करते हैं, तो प्रतिदिन हजारों लोग उनके चरण स्पर्श कर अद्भुत आनंद का अनुभव करते हैं।
उनकी वाणी संयमित, मधुर, परिमित व निर्दोष होती है। वे वचन की प्रामाणिकता व निश्चयता के प्रति पूर्ण जागरूक हैं। उनके प्रवचनों में एक-एक शब्द सार्थक होता प्रतीत होता है। वे वाणी भूषण हैं। उनकी भाषा-समिति के प्रति सजगता विरल उदाहरण प्रस्तुत करती है। वे श्रद्धालुओं को एक दिन में अनेक बार मंगलपाठ सुनाकर भी प्रसन्न रहते हैं।
उनके मन की एकाग्रता भी सधी हुई है। वे जब प्रवचन करते हैं तो उसमें लीन बन जाते हैं और जब वे दूसरे वक्ताओं को सुनते हैं तो सच्चे श्रोता बन जाते हैं। उनकी स्मृति तीव्र व प्रखर है। वे वर्षों पुरानी बात को भी ज्यों की त्यों सुना देते हैं। मन की एकाग्रता के ही यह सब परिणाम हैं। मन, वचन और काया की विभिन्न प्रवृत्तियों के बीच भी उनका साम्यभाव अविचल बना रहता है।
रत्नत्रय साधक :
जैन धर्म में सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन और सम्यक् चारित्र को रत्नत्रय की संज्ञा से अभिहित किया गया है। तत्त्वार्थ सूत्र में 'सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः' सूत्र से सम्यक् दर्शन, ज्ञान व चारित्र को मोक्ष का मार्ग बतलाया गया है। आचार्य श्री रत्नत्रय के साधक हैं। वे ज्ञान के हिमालय, दर्शन के दीपस्तंभ व चारित्र के चूड़ामणि हैं। वे प्रवचनों व प्रशिक्षणों के माध्यम से शिष्य समुदाय का आलोक बढ़ाते हैं। उनकी तर्क शक्ति प्रखर है। उनकी आगम निष्ठा अनुत्तर है। वे देव, गुरु और धर्म के प्रति पूर्ण निष्ठावान हैं। वे साधु के नियमों और मर्यादाओं के प्रति पूर्ण सजग हैं।
प्रबल पुरुषार्थी :
वे प्रबल पुरुषार्थी हैं और अपने पुरुषार्थ को परोपकार के लिए समर्पित कर देते हैं। वे एक कुशल यायावर हैं। देशाटन उन्हें खूब प्रिय है। वे अब तक 60 हजार किलोमीटर से अधिक पदयात्रा कर चुके हैं। भारत के साथ-साथ उन्होंने नेपाल व भूटान की भूमि को भी अपने चरणों से पावन किया है। उनकी यात्रा सिर्फ यात्रा नहीं रहती, उसके साथ जनकल्याण जुड़ा रहता है। उनकी 'अहिंसा यात्रा' ने लाखों लोगों को नशामुक्ति का संकल्प दिलाया है। सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति उनका मिशन बना हुआ है। उनके संदेशों ने विभिन्न धर्मों व वर्गों के लाखों-लाखों लोगों को नई राह दिखाई है। वे परोपकार व प्रबल पुरुषार्थ के कारण सभी के प्रिय बने हुए हैं।
श्रद्धा प्रणति :
आचार्य श्री महाश्रमणजी युगप्रधान, महातपस्वी, शांतिदूत, महायशस्वी, महामनस्वी, महामनीषी, मानवता के मसीहा, साधना के सुमेरु व शक्ति संपन्न आचार्य हैं। उनके चिंतन में उदारता, व्यवहार में मानवीयता और सफलता में विनम्रता है। वे शांत, दांत, कांत, सरल व्यवहार से संवृत्त, आकांक्षा-स्पृहा से विरक्त, जीवन और जगत के रहस्यों को खोजने में सदा रत और अपनी प्रज्ञा से जनकल्याण के लिए समर्पित भारतीय संत परंपरा के गौरव पुरुष व अनमोल रत्न हैं।
उनके जन्मोत्सव, पट्टोत्सव व दीक्षोत्सव के पावन प्रसंग पर हम अपनी संपूर्ण श्रद्धा समर्पित करते हैं और मंगल कामना करते हैं कि आप युगों-युगों तक तेरापंथ धर्मशासन व मानवता की सेवा करते रहें।
हर नई राह, हर नई चाह, हर नया गीत तुम्हें शुभ हो।
हर नया प्रभात, हर नई रात, पावन पुनीत तुम्हें शुभ हो।