आचार कुशल महापुरुष- आचार्य श्री महाश्रमणजी

रचनाएं

डा. मुनि मदन कुमार

आचार कुशल महापुरुष- आचार्य श्री महाश्रमणजी

तेरापंथ धर्मसंघ की आचार्य-परंपरा अत्यंत गौरवशाली है। आचार्य देव के लिये 'तीर्थंकर के प्रतिनिधि' जैसे महत्त्वपूर्ण और सम्मानसूचक शब्द का प्रयोग होता है। इस विरुद को धारण करने वाले सचमुच महापुरुष होते हैं। तरण-तारण की परंपरा अत्यंत उच्च है। जिनके पास निर्मल सम्यक्त्व और चारित्र हो तथा पुरुषार्थ की पराकाष्ठा हो, उनकी महानता का कहना ही क्या? ज्ञान और आचार की जिनमें विलक्षणता हो, वे निस्संदेह चक्खुदयाणं (श्रुतदाता), मग्गदयाणं (मार्गदाता) और सरणदयाणं (शरणदाता) होते हैं।
महामहिम आचार्य श्री भिक्षु स्वामी महामेधावी महापुरुष थे। वे अप्रमत्त साधक और भावितात्मा अनगार थे। उनका अन्तर्ज्ञान अद्भुत था। वर्तमान में आचार्य श्री महाश्रमणजी उनके पदचिह्नों पर चलने वाले विलक्षण महापुरुष हैं। वे स्वनामधन्य, युगप्रधान और श्रुतकेवली बनकर जगत के लिये त्राण बन रहे हैं। उनमें प्रवचन करने का बड़ा कौशल है तथा उनकी ज्ञान-संपदा बहुत विशिष्ट है। उनके विराट व्यक्तित्व में चारों ओर निरवद्यता के दर्शन होते हैं। साध्वाचार की सजगता उनमें चुम्बकीय आकर्षण पैदा कर रही है। जहाँ अप्रमाद होता है वहाँ साधना फलवती बन जाती है। भिक्षु-शासन का सौभाग्य है कि इसमें ऐसे नर-रत्न पैदा होते रहते हैं।
हमारे वर्तमान तीर्थंकरों- सीमन्धर आदि अर्हतों में पांच योग पाये जाते हैं। परमपूज्य आचार्य श्री महाश्रमणजी की सजगता को देखकर यह कहा जा सकता है कि उनमें प्राय: पांच योग ही पाये जाते हैं। निरन्तर शुभ योग में रहने वाले महापुरुष में पांच योग ही पाये जाते हैं। परम पावन आचार्य श्री महाश्रमणजी के जीवन में यदि क्षायिक सम्यक्त्व की प्राप्ति हो जाये और एकाभवतारी बन जाये तो कोई आश्चर्य जैसी बात नहीं लगती है। जिनके समत्व योग और अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग हो, वे महापुरुष महान उपलब्धियां प्राप्त कर सकते हैं। संसार में तीर्थंकर और चक्रवर्ती अतिशय पुण्यशाली पुरुष होते हैं। वर्तमान में भरत क्षेत्र में तीर्थंकर नहीं है किन्तु आचार्य श्री महाश्रमणजी जैसे पराक्रमी और कुशल आचार्य उनकी संपूर्ति कर रहे हैं। ज्योतिपुंज आचार्य श्री महाश्रमणजी की पुण्यवत्ता प्रबल है अत: उन्हें धर्मचक्रवर्ती कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं लग रही है। आगम में तीर्थंकर नाम कर्म माना गया है वैसे ही श्रुतधर आचार्य श्री महाश्रमणजी जैसे ज्योतिर्धर आचार्यों के लिये 'आचार्य नाम कर्म' मान लिया जाये तो क्या कठिनाई है? तीर्थंकर देव अलौकिक और अतिशय पुण्यशाली महामंगलकारी महापुरुष होते हैं, कोई-कोई आचार्यदेव भी अद्भुत और विलक्षण होते हैं।
आगम सूक्त है — महप्पसाया इसिणो हवंति! ऋषि महान् प्रसन्न चित्त होते हैं। आचार्य श्री महाश्रमणजी इस सूक्त के प्रतीक पुरुष हैं। उनमें चन्द्रमा जैसी निर्मलता, सूर्य जैसी तेजस्विता और सागर जैसी गंभीरता के एक साथ दर्शन किये जा सकते हैं। उनका व्यक्तित्व विराट है। उनके प्रभामंडित व्यक्तित्व का दर्शन करने वाला प्रभावित हो जाता है।
अध्यात्म योगी आचार्य श्री महाश्रमणजी को अपने दो महान पूर्वाचार्यों से भरपूर आशीर्वाद मिला है तथा आचार्यद्वय ने खुलकर पथ-दर्शन किया है। ऐसा परम सौभाग्य अतीत में किसी आचार्य को मिला हो, यह अन्वेषणीय है। महामहिम आचार्य श्री भिक्षु की परंपरा समृद्ध परंपरा है। 27 दशक के छोटे से कालखण्ड में इतने-इतने प्रतापी आचार्यों का होना सचमुच आश्चर्यपूर्ण है। इस धर्मसंघ ने व्यक्ति-निर्माण और ग्रंथ-निर्माण का बेजोड़ कार्य किया है। वर्तमान में आचार्य श्री महाश्रमणजी के पास दस पूर्ववर्ती आचार्यों की अनमोल विरासत है जिसका संरक्षण और संवर्द्धन वे बड़ी कुशलता से कर रहे हैं।
वीतरागता के निदर्शन आचार्य श्री महाश्रमणजी के बाह्य और आभ्यन्तर दोनों ही व्यक्तित्व सशक्त हैं। देदीप्यमान मुखमण्डल और मुस्कुराता वदन हर दर्शनार्थी को आकर्षित करता है। उनके पवित्र प्रभामण्डल में वैराग्य चेतना और वीतराग आत्मा के दर्शन होते हैं। उनके आभ्यन्तर व्यक्तित्व में सहजता, समरसता, विनम्रता, वत्सलता और प्रमुदिता का साक्षात्कार होता है इसलिये वे अनिमेष विलोकनीय हैं।
योगक्षेम वर्ष एक दूरदृष्टि है और आध्यात्मिक प्रशिक्षण का एक प्रयोग है। योगक्षेम वर्ष 1989 की तरह ही योगक्षेम वर्ष 2026 बहुत प्रभावशाली और आनन्ददायी प्रतीत हो रहा है। इसमें पूज्यप्रवर का जबरदस्त पौरुष बोल रहा है।