तुम क्या हो कैसे मैं जानूँ? इसका कोई राज बता दो

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साध्वी सुषमा कुमारी

तुम क्या हो कैसे मैं जानूँ? इसका कोई राज बता दो

तुम क्या हो कैसे मैं जानूँ? इसका कोई राज बता दो,
पट्टोत्सव का स्वर्णिम अवसर, हृद-तंत्री के तार बजा दो
सागर की उपमा मैं क्या दूँ? तेरा मन सागर से गहरा
नाप लिया सागर मानव ने, तेरे मन पर तेरा पहरा
कैसे थाह लगे असीम की, मेरी उलझन को सुलझा दो
आभामंडल में आकर्षण, नयनों में इमरत का वर्षण
शब्द-शब्द में है पथदर्शन, मंगलकारी जीवन दर्शन
चरण शरण की चाह शुभंकर, उपासना की हमें रज़ा दो
समता ममता बन सहचारी, हर पल दाएं-बाएं रहती
कर कमलों में श्रम सेवा, निशदिन तेरी धारा बहती
इन उर्जस्वल नयन युगल से, कण-कण में नव शक्ति सजा दो।